डॉ. रामवीर धर्म धर्म नहीं रहता जब वह हो जाता है रोजगार धर्म से जिनकी चले जीविका वे क्या करेंगे पर-उपकार। अर्थ और काम में जिनकी नहीं हुआ करती आसक्ति
डॉ. रामवीर जराजीर्ण कवि के मन को भी छूता दिखा वसन्त मनसिज निश्चल नहीं बैठता है जीवन पर्यन्त। गुलमोहर या आम्रमंजरी आदि जिसके आयुध ऋतु वसन्त में युद्धोद्यत हो घूम
डॉ. रामवीर फुर्सत में खुद से दो बातें कर के मन का ताप मिटाता पहले मित्र मिलने आते थे अब कोई न आता जाता। राजनीति औ धर्म ने मिल कर
डॉ. रामवीर प्रयागराज कुम्भ में भगदड़ में 49 मरे त्रिवेणी संगम पर पड़े हैं शव बिखरे पल भर में इतने लोग या तो मरते हैं आतंकवादियों के बमों से या
डॉ. रामवीर देख लिए उनके भी रंग पाया सबका एक ही ढंग बाहर से कितना भी ढका हो अन्दर से हर इंसां नंग। घर बाहर सर्वत्र छिड़ी है खुदगर्जी की
डॉ. रामवीर जो टीवी पर नित्य नियम से सुनते हैं समाचार उन्हें गलत लगने लगता है दो एवं दो चार। उनके लिए वही सच है जो बतलाती सरकार सत्यान्वेषी पत्रकार
डॉ. रामवीर गफलत में गलती से सच मुंह से निकल गया उसका ये सिला मिला दोस्त दुश्मन बन गया। जो प्रतिदिन सुबह-शाम पूछा करता था हाल ‘हुण कहंदा साड्डा नहीं
डॉ. रामवीर हे अन्धभक्त ! सादर प्रणाम मुझको तुम लगते हो महान आखिर कैसे कर लेते हो इतनी नफरत औ इतने काम। सुबह होते ही लग जाते फोर्वार्ड करने सब
डॉ. रामवीर हम तो सदा कहते आए हैं दोहरा रहे पुन: देश के माथे पर कलंक है पारस्परिक कलह। अगर चाहते हो सुख चैन न भूलें ये बैन ‘ईवन वार्स
डॉ. रामवीर कुछ तो अति अतीतजीवी हैं कुछ बस आधुनिकताजीवी, दो ध्रुवीय मित्रों के मध्य कहीं उपेक्षित पड़े हैं हम भी। जो कुछ बीता बीते युगों में वह सब था