डॉ. रामवीर
गफलत में गलती से सच मुंह से निकल गया उसका ये सिला मिला दोस्त दुश्मन बन गया।
जो प्रतिदिन सुबह-शाम पूछा करता था हाल ‘हुण कहंदा साड्डा नहीं रिश्ता ही थ्वाड्डे नालÓ।
जो हुआ सो ठीक हुआ उनका ये कहना है अब चैन से हैं जैसे कोई कांटा निकल गया।
ये दौर दूसरा है इसमें न सच की मांग वे खुश हैं झूठ की जो पी कर बैठे हैं भांग।
ये वक्त है जब बातें करना भी लगे फिजूल न सलाह किसी को दे न सलाह किसी से मांग।
इक वक्त था बिन मांगे भी दे देते थे सलाह अब सलाह नहीं फैशन होता जाता असलाह।
हमको है खबर कहते फिरते हैं हमें खराब वे क्या जानें शायर होते हैं खरे जनाब।