मनगढ़ंत कहानियों और झूठ का पुलिंदा: नोएडा श्रमिक आन्दोलन से सम्बन्धित मुकदमों (स्नढ्ढक्र नंबर 163/2026, 164/2026 और 165/2026) में क्क पुलिस द्वारा दायर की गयी चार्जशीट में क्या है?
कविता कृष्णपल्लवी
नोएडा के श्रमिक आन्दोलन के दौरान हुई हिंसा की छिटपुट घटनाओं के दो महीने बाद, उसके बाद व्यापक स्तर पर कार्यकर्ताओं और मज़दूरों की गिरफ़्तारियों के दो महीने बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस ने अंतत: इस मामले में दर्ज की गयी अनेक ए$फआईआर में से तीन में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाख़िल कर दिये हैं। इन भारी-भरकम दस्तावेज़ों में इस कद्र अन्तर्विरोधी बातों, असंगतियों और सरासर झूठ की भरमार है कि इनको पढ़ते हुए एक जागरूक, विवेकशील पाठक की दो ही प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं; या तो वह हँसते-हँसते लोटपोट हो जायेगा, या फिर उसका सर दर्द से भन्ना उठेगा। इन्हें पढक़र ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने मनोरम कथाएं लिखने वाले बेतरतीब लेखकों से ये आरोपपत्र तैयार करवाए हैं। बहरहाल, उत्तर प्रदेश पुलिस की अयोग्यता और मूर्खता की नुमाइश के बतौर, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, उसकी पूरी तरह झूठे आरोपों के आधार पर कार्यकर्ताओं और मज़दूरों को दुर्भावनापूर्ण ढंग से झूठे मु$कदमों में फँसाने तथा उनके विरुद्ध अन्यायपूर्ण अभियोजन चलाने की मंशा को उजागर करने के लिए, हम नीचे आरोपपत्र में मौजूद कुछ सबसे स्पष्ट विरोधाभासों की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं।
बार-बार बदलती तारीख़ें और स्थान:
आम तौर पर किसी भी मामले का सबसे बुनियादी और निर्विवाद तथ्य गिरफ़्तारी की तारीख़ और स्थान होता है। मगर उत्तर प्रदेश पुलिस के मामले में यह बात थोड़ी अलग साबित होती है। उनके लिए ये वे तथ्य हैं जो उनके ही अपने अलग-अलग दस्तावेज़ों में अलग-अलग हो सकते हैं! नोएडा श्रमिक आन्दोलन में दायर आरोपपत्र इसकी जीवन्त मिसाल है। तीनों आरोपपत्रों में, रूपेश रॉय, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान की गिरफ़्तारी की दर्ज तारीख़ें, उनकी रिमांड आदेशों में दर्ज गिरफ़्तारी की तारीख़ों से अलग हैं! ए$फआईआर संख्या 164 और 165 में इन चारों कार्यकर्ताओं के रिमांड आदेशों में गिरफ़्तारी की तारीख़ 17 अप्रैल दर्ज है, जबकि आरोपपत्र में आकृति, सृष्टि और मनीषा की गिरफ़्तारी की तारीख़ 27 अप्रैल तथा रूपेश की 7 मई बताई गई है। इसी प्रकार, ए$फआईआर संख्या 163 में रिमांड आदेश के अनुसार रूपेश की गिरफ़्तारी की तारीख़ 12 अप्रैल और आकृति, सृष्टि तथा मनीषा की 15 अप्रैल दर्ज है, जबकि आरोपपत्र में आकृति और सृष्टि की गिरफ़्तारी की तारीख़ 22 अप्रैल, मनीषा की 24 अप्रैल और रूपेश की 7 मई बताई गई है! यह भी उल्लेखनीय है कि इन चारों कार्यकर्ताओं को उत्तर प्रदेश एसटीए$फ ने 11 अप्रैल को ही शाम लगभग 7 बजे नोएडा के बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से, हज़ारों चश्मदीदों की मौजूदगी में और लाइव वीडियो प्रसारण के दौरान गिरफ़्तार किया था!
सत्यम वर्मा के मामले में भी, हम देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश पुलिस फिर वही गुस्ताख़ी दुहराती है। सीसीटीवी $फुटेज से सा$फ साबित होता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्यम को 17 अप्रैल की रात लगभग 11 बजे लखनऊ स्थित उनके आवास से उठाया था। लेकिन, आरोपपत्रों में एक बार फिर से हवाई दावा किया गया है कि उन्हें 19 अप्रैल को $फेज़-2 पुलिस स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया था। हिमांशु ठाकुर का मामला भी इससे अलग नहीं है। उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस ने दिल्ली के शालीमार बा$ग से उठाया था। ए$फआईआर संख्या 163 की केस डायरी संख्या 11 में दर्ज है कि उन्हें 18 अप्रैल को पुलिस थाने लाया गया था। लेकिन आरोपपत्र में उनकी गिरफ़्तारी की तारीख़ 19 अप्रैल और गिरफ़्तारी का स्थान $फेज़-3 पुलिस स्टेशन दर्शाया गया है।
उत्तर प्रदेश पुलिस का नकारापन और लापरवाही का आलम यह है कि वह अपने ही दस्तावेज़ों के अनुरूप एक सुसंगत घटनाक्रम तक प्रस्तुत नहीं कर पाती। श्रॉडिंगर का संदिग्ध: उत्तर प्रदेश पुलिस यह तक तय नहीं कर पा रही कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान सत्यम वर्मा आखऱि थे कहाँ।
उत्तर प्रदेश पुलिस के वे ‘माननीय’ अधिकारी, जो रिपोर्टें और आरोपपत्र तैयार कर रहे हैं, उन्हें पहले अपने ही कहानी पर एक राय बना लेनी चाहिए। जि़ला मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत तथा उनके द्वारा अनुमोदित उस दस्तावेज़ में, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा $कानून (एनएसए) के तहत सत्यम वर्मा को हिरासत में लेने के आधार बताए गए हैं, यह कहा गया है कि सत्यम 10, 11 और 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में मौजूद थे। लेकिन दायर किए गए आरोपपत्रों में वही उत्तर प्रदेश पुलिस दावा करती है कि उस अवधि के दौरान सत्यम नोएडा में थे ही नहीं!
उत्तर प्रदेश पुलिस मानो तथ्यों का बक्सा खोलने से ही इंकार कर रही है। नतीजतन, उसके एक दस्तावेज़ में सत्यम नोएडा में मौजूद हैं, जबकि दूसरे दस्तावेज़ में वे वहाँ से $गायब हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश पुलिस इस दार्शनिक पहेली से जूझ रही है, वहीँ ठोस तथ्य स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं कि उल्लिखित सभी तारीख़ों पर सत्यम लखनऊ में ही मौजूद थे। इतना ही नहीं, 10 अप्रैल और 13 अप्रैल को तो स्वयं उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें लखनऊ में हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ कर रही थी!
‘गुप्त षड्यंत्र बैठक ‘: बच्चों के पुस्तकालय और युवा केंद्र का सार्वजनिक उद्घाटन!
ए$फआईआर संख्या 165 के आरोपपत्र में उत्तर प्रदेश पुलिस की कहानी गढऩे की कला एक बार फिर देखने को मिलती है। इसमें दावा किया गया है कि 22 मार्च को दिल्ली के करावल नगर में आयोजित एक गुप्त बैठक में अभियुक्त कार्यकर्ताओं—सत्यम, आकृति, हिमांशु और सृष्टि—ने नोएडा में हिंसा की पूर्व-योजना बनाई थी। यह सच है कि 22 मार्च को ये चारों कार्यकर्ता करावल नगर में मौजूद थे। किन्तु, वहाँ केवल वे ही नहीं थे, बल्कि सैकड़ों अन्य लोग भी मौजूद थे, क्योंकि वे सभी लोग शहीद भगत सिंह युवा केन्द्र तथा शहीद भगत सिंह पुस्तकालय के सार्वजनिक उद्घाटन समारोह में शामिल होने आये थे। युवा केन्द्र का निर्माण एक वर्ष से अधिक समय से चल रहा था और उसके उद्घाटन समारोह की घोषणा 14 मार्च को ही कर दी गयी थी। इस कार्यक्रम में आस-पड़ोस के बच्चों के लिए आयोजित चित्रकला, शतरंज और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरित किये गये। बच्चों ने गीत प्रस्तुत किये तथा बुद्धिजीवियों, कवियों और लेखकों ने सभा को सम्बोधित किया। पूरे दिन के कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
यदि उत्तर प्रदेश पुलिस की नज़र में यह कार्यक्रम एक गुप्त षड्यंत्रकारी बैठक था, तो हमें इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा करावल नगर के छोटे-छोटे बच्चों को भी नोएडा मामले में सह-साजि़शकर्ता के तौर पर नामज़द कर दिया जाये!
हिंसक गतिविधियों और संदेशों के दावे: दो महीने से अधिक चली ‘जाँच’ के बाद भी दिखाने के लिए एक भी तस्वीर, वीडियो या संदेश नहीं!
तीनों आरोपपत्रों में उत्तर प्रदेश पुलिस दावा करती है कि अभियुक्त कार्यकर्ता हिंसक गतिविधियों में शामिल थे, या फिर उन्होंने भडक़ाऊ संदेशों और भाषणों के माध्यम से मज़दूरों को हिंसा के लिए उकसाया। 9 अप्रैल से ही इस पूरे घटनाक्रम के अनेक वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। 11 अप्रैल से, पुलिस ने गिरफ़्तार किये गये कार्यकर्ताओं और मज़दूरों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी अपने $कब्ज़े में ले रखे हैं। इसके अतिरिक्त, पुलिस के पास सभी सीसीटीवी $फुटेज उपलब्ध हैं। इन सभी उपलब्ध सामग्रियों के बावजूद उत्तर प्रदेश पुलिस राई के एक दाने के बराबर का भी कोई सबूत पेश नहीं कर पायी है —न एक भी संदेश, न एक भी तस्वीर और न ही एक भी वीडियो—जिससे यह साबित हो कि किसी भी कार्यकर्ता ने हिंसा के लिए किसी को उकसाया था या स्वयं किसी हिंसक गतिविधि में शामिल था।
आरोपपत्र दाख़िल करने के चरण तक पहुँच जाने के बाद भी उत्तर प्रदेश पुलिस के पास अपने बेहद संदिग्ध दावों के अलावा दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। यदि इतनी शक्तिशाली उत्तर प्रदेश पुलिस दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ऐसा एक भी सबूत प्रस्तुत नहीं कर पा रही है, तो कोई यह समझ सकता है कि या तो वह झूठ बोल रही है, या फिर पूरी तरह से ना$काबिल है। दुर्भाग्य से, सच यह है कि वह दोनों ही है।
गवाहों के शब्दश: समान बयान:
उत्तर प्रदेश पुलिस का मानो यह दृढ़ मत है कि एक बुरे काम को बुरे ढंग से ही किया जाना चाहिए! ए$फआईआर संख्या 163 के आरोपपत्र में दर्ज गवाहों के बयानों में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ अनेक गवाहों ने बिल्कुल एक जैसा बयान दिया है, शब्द-दर-शब्द! केस डायरी संख्या 28 में, रिचा ग्लोबल कम्पनी के एचआर प्रबंधक और दो सुरक्षा गार्डों के बयान पूरी तरह एक जैसे दर्ज किए गए हैं। वहीं, केस डायरी संख्या 1 में, दो अलग-अलग पुलिस अधिकारियों तथा पुलिस रिपोर्ट—तीनों के बिल्कुल एक ही बयान शब्दश: दर्ज किये गये हैं। उसी दस्तावेज़ में, दो अन्य अलग-अलग पुलिस अधिकारियों के बयानों में भी ठीक यही दोहराव देखने को मिलता है। ज़ाहिरा तौर पर, ये बयान पहले से तैयार किये गये हैं, उनमें मनमाने ढंग से हेर-फेर की गई और उन्हें बिना सोचे-समझे दोहराया गया है! यह लापरवाही से किया गया काम उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज किये गये गवाहों के बयानों की प्रामाणिकता के पीछे छिपे गंभीर सच को उजागर करता है। इससे इन दस्तावेज़ों में दर्ज प्रत्येक गवाह और अभियुक्त के बयान के मनगढ़ंत होने का गम्भीर संदेह उत्पन्न होता है।
इसे मज़दूरों और कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए डराने-धमकाने, उत्पीडऩ, हिरासत में यातना देने तथा सबूत गढऩे के अनेक आरोपों की रौशनी में देखने पर, ये विसंगतियाँ हमें इन आरोपपत्रों के एक-एक शब्द पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए विवश करती हैं।
अंतत: ये तीनों आरोपपत्र यही बताते हैं कि या तो उत्तर प्रदेश पुलिस पूरी तरह से रास्ता भटक गयी है, या फिर वह खुलेआम झूठ बोल रही है।
उपरोक्त उदाहरणों के अतिरिक्त भी इन आरोपपत्रों में बुनियादी तथ्यों—जैसे तारीख़ों और पतों—से लेकर दोषसिद्धि के स्पष्टत: बेबुनियाद और निराधार आरोपों तक, और हाँ, पुलिस अधिकारियों के हमेशा दिखने वाले 9-अंकों वाले $फोन नंबरों आदि जैसी अनगिनत त्रुटियों की भरमार है, जिनका यहाँ जि़क्र करना मुमकिन नहीं है।
इस जाँच की अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस की लगातार ज़ाहिर होती अयोग्यता, जिसका प्रमाण अब इन आरोपपत्रों में भी मिलता है, उसके असल मंसूबों को बेन$काब करती है। ये विरोधाभास और मनगढ़ंत दावे इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि आज उत्तर प्रदेश पुलिस कॉरपोरेट हितों के इशारे पर काम कर रही है। वे इन मालिकों के वर्दीधारी किराए के गुंडों की भूमिका निभा रहे हैं। अपने कॉरपोरेट आकाओं के प्रति व$फादारी साबित करने के लिए वे एक पूरी तरह अव्यवस्थित और त्रुटिपूर्ण जाँच चला रहे हैं तथा निर्दोष कार्यकर्ताओं और मज़दूरों को झूठे मामलों में फँसाकर उनके विरुद्ध अन्यायपूर्ण अभियोजन चला रहे हैं।