फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) केंद्रीय मंंत्री कृष्णपाल गूजर भले ही लोकसभा सदस्य होने के नाते देश की राजनीति के समुद्र में पहुंचा दिए गए लेकिन उनकी मेंढक वाली मानसिकता उन्हें नगर निगम के तालाब से बाहर नहीं निकलने दे रही। अभी तक तो ये पार्षदों के काम हड़प कर शिलान्यास-उद्घाटन करने के कारण जनता के बीच अपनी बेइज्जती करा रही रहे थे लेकिन शनिवार को नगर निगम की बैठक में भी पहुुंच कर मेयर के होते हुए बैठक की अध्यक्षता कर अपनी ओछी मानसिकता का परिचय देते नजर आए। ऐसा नहीं है कि केंद्रीय मंत्री निगम सदन की बैठक में नहीं आ सकते, पदेन सदस्य होने के कारण वह बैठक में भाग ले सकते हैं और अपनी राय रख सकते हैं जिसे मानना या न मानना सदन पर निर्भर है, अध्यक्षता तो जनता द्वारा चुनी गई मेयर ही करेगी।
दरअसल, गूजर भी संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मिट्टी में मिलाने की संघी-भाजपाई मानसिकता के ही पालनकर्ता हैं। डींगें तो ट्रिपल इंजन सरकार की हांकी जाती हैं लेकिन भाजपाई तानाशाह मोदी-शाह के चरणचिह्न पर चलने वाले कृष्णपाल गूजर भी वही कर रहे हैं। जनता ने उन्हें केंद्र में भेजा है जबकि प्रवीण बत्रा जोशी को मेयर व अन्य 46 को पार्षद पद का अधिकार दिया है यानी शहर के विकास की क्या रणनीति होगी इन्हें ही तय करने दिया जाए। इसके विपरीत नगर निगम में अपना वर्चस्व साबित करने के लिए केंद्रीय मंत्री न केवल खुद पहुंचे बल्कि अपने चिंटू विधायकों धनेश अदलखा, मूलचंद शर्मा और राज्यसभा चुनाव में भाजपा की नइया डुबोने वाले सतीश फागना को भी लेकर पहुंच गए।
जानकार कहते हैं कि गूजर ने यह सब नाटक इसलिए किया कि वह नगर निगम में अपनी बपौती साबित करना चाहते थे। दरअसल, गूजर को घमंड है कि भाजपा के जितने भी पार्षद हैं, वह सब उनके समर्थन के कारण ही जीत सके। इसलिए उन्हें मुगालता है कि सदन में जो वह कहेंगे सारे पार्षद उसे ही पास करेंगे। मेयर प्रवीण बत्रा जोशी ने पार्षद और मेयर की निधि बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव रखा जिसे गूजर के चालीस पार्षदों ने खारिज कर दिया, इसे सदन में गूजर की जीत और पकड़ के रूप में देखा जा रहा है। जानकार यह भी कहते हैं कि गूजर ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए सदन की बैठक की अध्यक्षता की। सुधी पाठकों को याद होगा कि चालीस पार्षद होने के कारण गूजर ने करीब आठ महीने पहले वरिष्ठ उप महापौर और उपमहापौर का चुनाव करने के लिए सदन की बैठक की थी। सारे पार्षद और चरणचुंबक विधायक तब भी मौजूद थे, लेकिन पांच घंटे सदन में बैठे रहने के बावजूद गूजर इन दोनों पदों के लिए अपने चहेते पार्षदों के नाम की घोषणा नहीं कर पाए थे, तब मेयर प्रवीण बत्रा बैठक में नहीं आई थीं, गूजर की इस बेइज्जती के पीछे कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल का हाथ होना चर्चा में रहा था।
गूजर और गोयल के बीच शीतयुद्ध किसी से छिपा नहीं है। संभवत: यही कारण है कि केंद्र सरकार में पहुंचने के बावजूद गूजर नीचता पर उतरते हुए कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल के महकमे में अड़ंगी मारने का आतुर नजर आ रहे हैं। उनकी यह आतुरता सदन की बैठक में भी नजर आई जहां चाटुकार पार्षदों के कारण मेयर प्रवीण बत्रा जोशी अधिकारविहीन सी नजर आईं। गूजर के इशारों पर पार्षदों ने जो भी प्रस्ताव पारित किए उनके लिए प्रवीण बत्रा जोशी रबड़ स्टांप साबित हुईं। जानकार कहते हैं कि गूजर चाटुकार पार्षदों के सहारे भले ही सदन में अपना दबदबा दिखा लें लेकिन ऊपर तो महकमे के पिताजी यानी कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल बैठे हैं, इन प्रस्तावों पर कैसे आपत्ति लगाकर उन्हें ठंडे बस्ते में पहुंचाना है, किन प्रस्तावों के पर कतरने हैं या किन्हें हाईलाइट करना है यह अंतिम रूप से गोयल को ही तय करना है। इतना जरूर है कि इन दोनों नेताओं की लड़ाई में घटिया सेवाओं के रूप में नागरिकों की परेशानी बढऩे वाली है। राजनीति जानकारों का यह भी कहना है कि नगर निगम स्तर की राजनीति करना कृष्णपाल गूजर की बहुत बड़ी मजबूरी है, यदि वे यह नहीं करेंगे तो उनका कॅरियर ही खत्म हो जाएगा। कैसे?
इस सवाल पर उनका कहना है कि केंद्र सरकार जमीनी स्तर पर यानी जनता से जुड़े कोई काम नहीं करा रही है, वह पूंजीपतियों, धन्ना सेठों को लाभ पहुंचाने वाले बड़े बड़े प्रोजेक्ट बना रही है जिसका आम जनता को कोई फायदा नहीं होने वाला। इन हालात में गूजर तो क्या देश भर में भाजपा सांसद निठल्ले साबित हो रहे हैं। ऐसे में अपने को जिंदा रखने के लिए ये केंद्र के समुद्र में होने के बावजूद नगर निगम के कुंए में ही टर्रा कर जनता के बीच अपना अस्तित्व बचाने में जुटे हैं। हरियाणा ही नहीं पूरे देश में भाजपा शासित प्रदेशों में हालत यह हैं कि सांसद, विधायक किसी नाली-खड़ंजे का उद्घाटन करते नजर आते हैं। यानी नगर निगम की बैठक में अध्यक्षता करना अपना वर्चस्व साबित करने से ज्यादा गूजर का राजनीति में अस्तित्व बचाए रखने की कवायद है।