फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते सप्ताह ओल्ड फरीदाबाद के रेलवे अंडरपास में दो बैंक अधिकारियों के डूब मरने को लेकर इसे दस दिनों तक बंद रखने के बाद सोमवार 23 सितम्बर को खोला गया। प्रश्न पैदा होता है कि शहर के दो हिस्सों को जोडऩे वाले इस महत्वपूर्ण अंडरपास को 10 दिनों तक क्यों बंद रखा गया? क्या यह प्रशासन द्वारा मृतकों के प्रति शोक मनाने का तरीका था? यद्यपि इस बाबत प्रशासन की ओर से कुछ भी नहीं कहा गया है लेकिन समझा जा रहा है कि कुंद जहन अधिकारी 10 दिनों तक यह सोचते रहे कि समस्या का क्या हल करें?
अपनी ‘कुशाग्र बुद्धि का जलवा दिखाते हुए प्रशासन ने जहां यह मान लिया कि पानी निकासी तो उनके बस की बात नहीं, वहीं अंडरपास के दोनो ओर गेट लगवा दिये, जिन्हें पानी भरने पर बंद कर दिया जाएगा। लेकिन यहां एक और बड़ा सवाल पैदा होता है कि इन गेटों को बंद कौन करेगा? क्या इसके लिये भी पुलिस को फोन करना पड़ेगा, क्योंकि जो नगर निगम कर्मी बैरीकेड नहीं लगा सकते वे ‘बेचारे भला गेट कैसे बंद कर सकेंगे? यानी कि मामला तो फिर जहां का तहां रह गया। हां, इसमें मिट्टी भरवा कर स्थायी तौर पर बंद कर दिया जाए तो क्लेश सदा के लिये कट सकता है। यही फार्मूला शहर के दो अन्य अंडरपासों पर भी लागू किया जा सकता है।
प्रशासन के इस आपराधिक कृत्य के लिए जहां उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज करके दोषियों को दण्डित कराया जाना चाहिए था, वहीं इस काण्ड पर लीपापोती करने के लिये मजिस्ट्रेटी जांच का लोक दिखावा किया जा रहा है। यह लोक दिखावा भी शायद न हुआ होता यदि राज्य के मुख्य सचिव ने इसका स्वत: संज्ञान लेकर जि़ला प्रशासन की जवाब-तलबी न की होती। विदित है कि बीते दो-तीन माह में एक व्यक्ति बल्लबगढ़ के नाले में डूब मरा तो दूसरा सेक्टर 22 में श्मशान घाट के सामने एफएमडीए द्वारा खोदे गए गड्ढे में गिर कर मर चुका था। इन दोनों पर तो प्रशासन ने कोई लीपापोती करने की जरूरत नहीं समझी।
मज़दूर मोर्चा की गारंटी है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध पुलिस में मुकदमा दर्ज कराकर उन्हें दंडित करा दिया जाए तो भविष्य में इस तरह से कोई भी नागरिक बेमौत नहीं मरेगा।