डॉ. रामवीर
हे अन्धभक्त ! सादर प्रणाम मुझको तुम लगते हो महान आखिर कैसे कर लेते हो इतनी नफरत औ इतने काम।
सुबह होते ही लग जाते फोर्वार्ड करने सब फेक न्यूज अपनी दुनिया में रहते हो न और किसी के सुनते व्यूज।
नित नियम से नेहरू की निन्दा औ गरियाना गांधी जी को ये दोनों काम दिखाते हैं भेजे में संचित कूड़े को।
कोई तुमको क्या समझेगा इसकी न तुम्हें परवाह तनिक पर निन्दा से तृप्ति होती बाकी बातें सब लगें क्षणिक।
तुम जो इतिहास सुनाते हो उससे पैदा होता है हास्य चंडूखाने की गप्पें भी तुमको लगती हैं वेदभाष्य।
बच्चा बचपन में जो खाता वह उसका टेस्ट हो जाता है जो झूठ बालपन में पढ़ता आजीवन उसको ढोता है।
मुझको तुमसे न कोई बैर चाहता हूं तुम्हारी सदा खैर चाहो तो भ्रान्तियां मिट सकतीं यदि मानो मुझको नहीं गैर।