डॉ. रामवीर
प्रयागराज कुम्भ में भगदड़ में 49 मरे त्रिवेणी संगम पर पड़े हैं शव बिखरे पल भर में इतने लोग या तो मरते हैं आतंकवादियों के बमों से या आस्थावादियों के भ्रमों से
दोनों घटनाओं के पीछे मूल विचार वही है मन्नत मांगने या जन्नत जाने की चाह इतनी बलवती है कि लाखों श्रद्धान्ध समझते हैं बस वे ही सही हैं जब जागती है भक्ति तो सो जाती है चिन्तन शक्ति निष्काम कर्म के उपदेशकों में भी पाई जाती है आसक्ति
धर्मों के मतभेद भले ही हों अनेक पर आस्था के मामले में हर धर्म है एक आस्था कुम्भ में ले जाए या काबा में दोनों ही रूप में आहत होता है विवेक
चींटियां करती हैं सभी काम उत्पादन संग्रहण वितरण पर नहीं मचती उनमें भगदड़ अकारण पंक्तिबद्ध संचलन सैनिकों से भी अधिक अनुशासन उनकी आस्थाहीन व्यवस्था बताती है मानव से बेहतर है चींटियों की सभ्यता की अवस्था आज तक नहीं मरी कोई चींटी दूसरी चींटी से टकरा कर व्यवस्था में ही है उनकी आस्था फिर भी मनुष्य अपनी उत्कृष्टता का करता है बखान हन्त ! चींटियों से कुछ नहीं सीखा इन्सान।