डॉ. रामवीर
देख लिए उनके भी रंग पाया सबका एक ही ढंग बाहर से कितना भी ढका हो अन्दर से हर इंसां नंग।
घर बाहर सर्वत्र छिड़ी है खुदगर्जी की भीषण जंग जिनसे थी उम्मीद गुलों की वे भी फेंक रहे हैं संग।
कैसे किसी पर करें भरोसा नेता हुए गिरगिट मानन्द राजनीति में पता न चलता कौन विरोधी कौन है संग।
युगों युगों से पालित पोषित मर्यादाएं हो रही भंग बदली हुई परिस्थितियों में सत्य आज लगता है व्यंग।
छोटे से जीवन में देखे हमने ऐसे दुखद प्रसंग छोड़ो भी अब क्या बतलाएं सुन कर होगे व्यर्थ ही तंग।