फुर्सत में खुद से दो बातें…

फुर्सत में खुद से दो बातें…
February 16 08:13 2025

डॉ. रामवीर

फुर्सत में खुद से दो बातें
कर के मन का ताप मिटाता
पहले मित्र मिलने आते थे
अब कोई न आता जाता।

राजनीति औ धर्म ने मिल कर
ऐसा कुछ माहौल बिगाडा
जहां चार जन हुए इक_े
बन जाता है वही अखाड़ा।

कोई किसी पर फिदा है इतना
जैसे मजनूं का अवतार
और दूसरे कहते उस को
उचित है लगने जूते चार।

गर्मागर्म बहस मुबाहसा
आरोपों की तेज बौछार
निन्दा और प्रशंसा की ही
घर घर में बह रही है धार।

कुछ लोगों ने दिया था नारा
अब की बार चार सौ पार
पार नहीं कर पाए तो फिर
अब खुद से ही हैं शर्मसार

दलों की दलदल से जो दूर हैं
कवि सुनता है उनके विचार
और बात का सार यही है
फूलों से अच्छे हैं खार।

फूलों की भांति आकर्षक
रूप रंग से जो हैं लुभाते
वे ही अन्तत: क्षुद्र स्वार्थवश
घृणित भयावह रोल निभाते।

यही कामना है कि देश में
अब होवे कुछ ऐसा सुधार
राजनीति न बनने पाए
तुच्छ स्वार्थसिद्धि का आधार।

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