अशोक कुमार पांडेय रंग-भंग सब भूल के मस्जिद पर हुड़दंग भौजी तरसें रंग को सूने पड़े मृदंग सूने पड़े मृदंग होरिहर चीखें डीजे संग खड़ी प्रेमिका बंसवाड़ी में नारे सुन-सुन
डॉ. रामवीर हम को हठी समझ लेते हैं कुछ अबोध सज्जन क्योंकि उनकी अनुचित बातें हम न करते सहन। हठ नहीं अपितु स्वाभिमान है करें न खल-वन्दन हम साधारण काठ
डॉ. रामवीर यूं तो सब सामान्य है किन्तु फिर भी मन रहता है उदास देश की बिगड़ी दशा देख कर प्राय: हो जाता हूं निराश। एक नागरिक के नाते मैं
सनत जैन तिलक है, बारात है, मेंहदी है, हल्दी है, संगीत है, रोशनी है, आतिशबाजी है, बैंड बाजा है, लाईट है, डी जे है, कैटरर है, स्टॉल है, सब कुछ
डॉ. रामवीर धर्म धर्म नहीं रहता जब वह हो जाता है रोजगार धर्म से जिनकी चले जीविका वे क्या करेंगे पर-उपकार। अर्थ और काम में जिनकी नहीं हुआ करती आसक्ति
डॉ. रामवीर जराजीर्ण कवि के मन को भी छूता दिखा वसन्त मनसिज निश्चल नहीं बैठता है जीवन पर्यन्त। गुलमोहर या आम्रमंजरी आदि जिसके आयुध ऋतु वसन्त में युद्धोद्यत हो घूम
डॉ. रामवीर फुर्सत में खुद से दो बातें कर के मन का ताप मिटाता पहले मित्र मिलने आते थे अब कोई न आता जाता। राजनीति औ धर्म ने मिल कर
डॉ. रामवीर प्रयागराज कुम्भ में भगदड़ में 49 मरे त्रिवेणी संगम पर पड़े हैं शव बिखरे पल भर में इतने लोग या तो मरते हैं आतंकवादियों के बमों से या
डॉ. रामवीर देख लिए उनके भी रंग पाया सबका एक ही ढंग बाहर से कितना भी ढका हो अन्दर से हर इंसां नंग। घर बाहर सर्वत्र छिड़ी है खुदगर्जी की
डॉ. रामवीर जो टीवी पर नित्य नियम से सुनते हैं समाचार उन्हें गलत लगने लगता है दो एवं दो चार। उनके लिए वही सच है जो बतलाती सरकार सत्यान्वेषी पत्रकार