(स्कूल अध्यापक रजनीश गंगवार द्वारा विद्यार्थियों को सम्बोधित कविता) कांवड़ लेने मत जाना तुम ज्ञान के दीप जलाना मानवता की सेवा करके तुम सच्चे मानव बन जाना शिक्षा है जग
डॉ. रामवीर मैं व्याकुल हूं प्रश्नाकुल हूं किससे करूंं सवाल पूछो तो उत्तर नहीं मिलता हो जाता है बवाल। आज देश में देख रहा हूं ऐसे ऐसे दृश्य जिन्हें देख
डॉ. रामवीर आज देश में सत्य बिचारा पड गया है बीमार बीजेपी का आईटी सैल है इसका जिम्मेदार। सत्य अकेला और निहत्था ट्रोलर कई हजार जब देखो करते ही रहते
पिता पर लिखी निदा फ़ाज़ली की कविता ”फ़ातेहा’ पढ़ी होगी आपने। आज पिता पर अजय दुज्र्ञेय की कविता पढि़ए। इतनी साफग़ोई से इस तरह कविता अबतक नहीं कही गई होगी।
डॉ. रामवीर जो बोओगे वो काटोगे उक्ति है बहुत पुरानी अचरज होता बूढ़ों को भी पड़ती है समझानी। जान बूझ कर जो समाज में फैलाते हैं घृणा घृणा की खेती
1. पहली मई मैं बीस साल का हूं लेनिन जि़न्दा हैं लाल चौक लदा हुआ है झण्डों से और खड़े हैं कतारबद्ध पन्द्रह करोड़ लोग पैंतीस साल बीत गए मैं
बहुत से काम बाकी हैं, तुम्हारे भी हमारे भी करोड़ों लोग भूखे हैं, तुम्हारे भी हमारे भी खिलौनों वाली उम्र में, उन्हें हम मौत क्यों बांटें बड़े मासूम बच्चे हैं,
डॉ. रामवीर बीजेपी के आईटी सैल से निकल रहा जो कूड़ा कचरा वह युवकों के दिलो-दिमाग में धीरे धीरे जा रहा पसरा । झूठी खबरें गलत सूचना देने वाले बेहया
डॉ. रामवीर जो भी सत्ता में आता है हो जाता है वही घमंडी जैसी पहले कांग्रेस थी वैसी ही भाजपा पाखंडी। जनता को बहला फुसला कर तरह तरह के स्वप्न
डॉ. रामवीर मैं भी प्यार करने वाला हूं मैं हूं नहीं निरा आलोचक मुश्किल है कि कहां से लाऊं बंदा जो हो प्यार के लायक। आज देश में बने हुए