डॉ. रामवीर गफलत में गलती से सच मुंह से निकल गया उसका ये सिला मिला दोस्त दुश्मन बन गया। जो प्रतिदिन सुबह-शाम पूछा करता था हाल ‘हुण कहंदा साड्डा नहीं
डॉ. रामवीर हे अन्धभक्त ! सादर प्रणाम मुझको तुम लगते हो महान आखिर कैसे कर लेते हो इतनी नफरत औ इतने काम। सुबह होते ही लग जाते फोर्वार्ड करने सब
डॉ. रामवीर कुछ तो अति अतीतजीवी हैं कुछ बस आधुनिकताजीवी, दो ध्रुवीय मित्रों के मध्य कहीं उपेक्षित पड़े हैं हम भी। जो कुछ बीता बीते युगों में वह सब था
डॉ. रामवीर औरों जैसा ही हो जाना लक्ष्य नहीं मेरे जीवन का, जब मैं स्वयं सोच सकता हूं क्यों पिछलग्गू बनूं किसी का। कुछ पा जाने की चाहत में निशदिन
रंजू राही ऑटो रिक्शा में जो लाश पड़ी है किसकी है? मेरे पिता की है साहब! ऐसे सड़क पर ये कौन महिला बच्चा जन रही है? मेरी पत्नी है साहब!
डॉ. रामवीर जनता के जगने की सारे नेता करते रहते प्रतीक्षा, किन्तु स्वयं सोए रहते हैं अपनी करते नहीं समीक्षा। जो नेता सार्वजनिक मंच से बेशर्मी से झूठ बोलता, जनता
डॉ. रामवीर नेता हों या होवें पुजारी सब के सब हो गए व्यापारी, राजनीति में और धर्म में घुसे हुए हैं कारोबारी। नेताओं को नहीं दीखती बेबस जनता की लाचारी,
डॉ. रामवीर समझाने वाले ज्यादा हैं और समझने वाले कम, इस हालत में दिल की बातें कैसे किसे सुनाएं हम। अब संवाद नहीं होता है बहस वास्ते ठोकें खम, लगता
डॉ. रामवीर जिन दोनों ने अंग्रेजों की नाक में डाली नकेल, गुजरात में ही जन्मे थे गान्धी और पटेल। किन्तु उसी में जन्मा जिन्ना औ फिर जन्मा मोदी, जिन्ना ने
डॉ. रामवीर हां जी हां जी करते जाने का हो सका न आदी, ठकुरसुहाती की गठरी भी कभी न सर पे लादी। जो जैसा है उस को वैसी खरी खरी