डॉ. रामवीर
हां जी हां जी करते जाने का हो सका न आदी, ठकुरसुहाती की गठरी भी कभी न सर पे लादी।
जो जैसा है उस को वैसी खरी खरी सुना दी, कुछ पाने के लिए प्रलोभन वश न करी मुनादी।
राजनीति में लोग देखते कौन चल रहा आगे, फिर चाहे वह कैसा भी हो उस के पीछे भागे।
राजनीति के पट में लगे हैं षड्यन्त्रों के धागे, जो भी सियासत में आता है वह सज्जनता त्यागे।
घुस गए हैं दुर्जन ही दुर्जन राजनीति के अन्दर, कर्मों से इंसान न लगते लगें सियासी बन्दर।
बन्दर उछल कूद करते हैं औ देते हैं घुडकी, घोषित नीति क्रियान्वयन की नीयत नहीं है इनकी।
नेताओं को अगर देश से होता सच्चा लगाव, तो दलबदल व भ्रष्टाचार का बढता नहीं प्रभाव।