डॉ. रामवीर
जनता के दुख दर्द की जिन्हें नहीं परवाह भ्रष्टाचार से जुटा रहे जो सम्पत्ति अथाह
जिनके मुख से झूठ का होता सतत प्रवाह अन्धभक्त करते मिले उनकी भी वाह वाह।
देश दशा को देख कर दिल में होता दाह लगता जैसे देश ही भूल गया है राह।
कोई ऐसा न रहा जो कर सके आगाह भक्तों की भारत माता है बस मोदी और शाह।
धनपतियों से थोक में चंदा रहे उगाह भ्रष्टाचार को दे रहे सत्ताधारी पनाह।
स्वयंसेवक समझते स्वयं को बादशाह मंहगाई की मार से जनता रही कराह।
पाखंडी बाबाओं का देखो तो उत्साह लोगों को नित दे रहे उल्टी सीधी सलाह।
ऐसे वातावरण में कवि की बस यह चाह देश प्रगति पथ पर बढे मिटे आपसी डाह।