शिकार

शिकार
July 04 15:01 2025

पिता पर लिखी निदा फ़ाज़ली की कविता ”फ़ातेहा’ पढ़ी होगी आपने। आज पिता पर अजय दुज्र्ञेय की कविता पढि़ए। इतनी साफग़ोई से इस तरह कविता अबतक नहीं कही गई होगी। ऐसी कविता कहने के लिए हिम्मत चाहिए। चीज़ें साफ़-साफ़ और अलग-अलग देखने की दृष्टि भी।
मुझे याद है कि जब मैं दूसरी में था
तो किसी ने मेरी पेंसिल चुरा ली थी।
आपने कहा था-
‘तुम अपनी चीजों का भी ध्यान नहीं रख सकते?
मुझे कुछ नहीं पता-
अब या तो अपनी पेंसिल ढूंढो
या फिर मास्टर से अपनी पीठ तुड़वाओ’

और इस प्रकार मैं आत्म-निर्भर बना
जब मैंने जीवन की पहली चोरी की।

मुझे याद है कि वे भी आप ही थे
जिन्होंने मुझे अकेले में सिखाया था
कि शर्मा अंकल के पैर छूने हैं,
गुप्ता अंकल को प्रणाम कहना है।
मैंने आपको टोकते हुए पुछा था- और भारती अंकल को?
मुझे याद है आपकी आँखें लाल हो गई थीं

और इस प्रकार मैं व्यवहार-कुशल बना
जब मैंने जीवन में पहली बार जातिवाद जाना।

मुझे यह भी याद है कि
कैसे शुरू से ही आपने मेरे लिए, बहन से
दो अतिरिक्त ग्लास दूध,
कुछ अतिरिक्त ट्युशन क्लासेस
और दुआरे वाले ठंडे कमरे का प्रबंध किया था

और इस प्रकार मैं आपकी ‘प्रिय संतान’ बना
जब मैं जीवन में जीवन में पहली बार पुरुष बना।

और भला मैं कैसे भूल सकता हूँ
कि वे आप ही थे जिन्होने
मुझे आरिफ़ के साथ बैठने से मना किया था।
आप ही थे जिन्होंने मुझे बताया था कि
‘ये लोग’ नहाते नहीं हैं,
हमसे नफऱत करते हैं और
हमें खाना देते हुए खाने में थूक देते हैं

और इस प्रकार मैं समझदार बना
जब मैं जीवन में पहली बार साम्प्रदायिक हुआ।

और इस तरह, ठीक इसी तरह
आपने मेरे जीवन की लगभग हर चीज तय की पापा!
मैं किससे बात करूँगा,
किसके साथ खेलूंगा,
कैसे बोलूँगा,
कैसे व्यवहार करूँगा,
क्या पहनूँगा, क्या पढूँगा,
किससे प्रेम करूँगा,
कैसा जीवन जिऊँगा?
सब-कुछ आपने तय किया…

और इसीलिए आपका शुक्रिया।
आपका शुक्रिया पापा!
जो आपने मेरा जीवन आसान किया,
मुझे जीना सिखाया।
लेकिन फिर भी मैं आपसे घृणा करता हूँ…
घृणा- क्योंकि आपने, एक सिफऱ् आपने मुझे मनुष्य नहीं होने दिया।

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Mazdoor Morcha
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