केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल को दिखाई गई औकात फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर के सबसे पुराने औद्योगिक संगठन फऱीदाबाद इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (एफआईए) ने केंद्रीय भारी उद्योग सहित कई विभागों के राज्यमंत्री कृष्णपाल गूजर को अपने 72वें सालाना जलसे कैटलिस्ट, 25 में न बुलाकर उनकी औकात बता दी है। खुद को फरीदाबाद का सबसे कद्दावर नेता कहला कर खुश होने वाले गूजर को कार्यक्रम में न बुलाया जाना दर्शाता है कि चुनाव में मोटा फंड देने वाले उद्योग जगत में उनके प्रति कितनी नाराजगी है, क्योंकि प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक शहर में बीते 12 साल से सत्ता सुख भोगने के बावजूद उन्होंने न तो शहर के लिए कुछ किया और न ही उद्योगों के लिए।
एफआईए ने बीते शनिवार सूरजकुंड स्थित एक होटल में कैटलिस्ट 25 का भव्य आयोजन किया। क्योंकि कार्यक्रम उद्योग जगत का था इसलिए समझा जा रहा था कि इसके मुख्य अतिथि केंद्रीय भारी उद्योग राज्यमंत्री कृष्णपाल गूजर होंगे और उद्योग जगत इस कार्यक्रम के जरिए उनसे उद्योगों की बेहतरी की कुछ घोषणाएं करवाएगा, लेकिन पता चला कि मुख्य अतिथि तो दूर उन्हें कार्यक्रम का न्यौता तक नहीं दिया गया। उनकी जगह कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल को विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया गया था। मंत्री राजेश नागर भी एफआईए के न्यौते पर कार्यक्रम में पहुंचे थे।
जानकार कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री खास कर भारी उद्योग राज्यमंत्री होने के बावजूद गूजर को नहीं बुलाया जाना उद्यमियों का उनसे मोहभंग होने का स्पष्ट संकेत है। मोहभंग हो भी क्यों न, उद्योग मंत्री होने के बावजूद आज तक उन्होंने फरीदाबाद के उद्योगों के हित में कोई काम नहीं किया, जो घोषणाएं भी कीं वो आज तक घोषणाएं ही बनी हुई हैं, एक पैसे का काम नहीं हुआ। भाजपा को करीब से जानने वाले कहते हैं कि बेचारा गूजर कर भी क्या सकता है, सब जानते हैं कि कोई भी मंत्रालय हो, उसे चलाती मोदी-शाह की जोड़ी ही है, मंत्री, राज्यमंत्री तो मुखौटा भर होते हैं। गूजर भी कहां आज तक अपने काम के सहारे चुनाव जीते हैं, हर बार मोदी के नाम पर वोट मांगा, इस बार तो मोदी लहर भी नहीं थी तो चुनाव आयोग ने सहारा दिया और गूजर चुने गए। मोदी-शाह ने उन्हें कठपुतली राज्यमंत्री बना दिया, बेचारे की डोर जब ऊपर वाले चलाएंगे तब ही तो वह चलेगा। किसी बड़ी घोषणा की बात तो दूर, उसके लिए खुद मोदी मौजूद है, मंत्रालय कोई भी हो मंत्री कोई भी हो उद्घाटन तो मोदी ही करते हैं। यही कारण है कि आकाओं की मर्जी के बिना गूजर ने जो घोषणाएं कीं वो धरातल पर नहीं उतरीं। जानकार कहते हैं कि आम जनता को यह हकीकत भले ही न मालूम हो लेकिन चुनाव में खजाने का मुंह खोल कर नेताओं की जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाने वाले उद्योग जगत से यह सच्चाई नहीं छिपी है। उसे भी मालूूम है कि कठपुतली राज्यमंत्री की औकात, नगर निगम के नाली-खड़ंजों के शिलान्यास और उद्घाटन से ज्यादा कुछ नहीं है, तो उसे इतने बड़े कार्यक्रम में बुला कर समय और धन की बर्बादी ही होने वाली थी।
जानकारों के अनुसार इसके विपरीत राज्य की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल करने वाले कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल ने विशिष्ट अतिथि के रूप में घोषणा की कि अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने उद्योग जगत की बेहतरी के लिए जो पॉलिसी बनाई थी, कैबिनेट मंत्री रहते हुए उस पॉलिसी को फिर से लाएंगे और लागू कराएंगे। सुधी पाठकों को तो याद ही होगा कि पहले कार्यकाल में विपुल गोयल उद्योग मंत्री बने थे लेकिन कृष्णपाल गूजर ने उन्हें अपनी कुर्सी के लिए खतरा मानते हुए दोबारा चुनाव में उनका टिकट कटवा दिया था। सत्ता से बाहर रहते हुए विपुल ने भाजपा में अपना कद गूजर से भी इतना अधिक बढा लिया कि इस बार गूजर पूरा जोर लगाने के बावजूद भी उनका टिकट न कटा सके। दूसरी तरफ सत्ता के मद में चूर कृष्णपाल गूजर जनता को वरगलाने व लूट कमाई में इस कदर अंधे हो गए कि उन्हें जनता के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रहा।
तीसरी बार सत्तारूढ़ होने पर गूजर फिर से जनता को बेवकूफ बनाने व अपने लूट कमाई के धंधे में पूरी तरह से जुट गए। जो उद्योग जगत सत्ता से हटने के बाद विपुल को बिसरा बैठा था अब फिर से उन्हें अपने कंधे पर बैठा रहा है, केंद्रीय राज्यमंत्री को उतार कर उद्योग जगत के लिए उनकी निस्सारता बता रहा है।