सनत जैन
तिलक है, बारात है, मेंहदी है, हल्दी है, संगीत है, रोशनी है, आतिशबाजी है, बैंड बाजा है, लाईट है, डी जे है, कैटरर है, स्टॉल है, सब कुछ तो है … पर जनवासा नहीं है, पंगत नहीं है, पत्तल नहीं है, पीयर धोती पहने समधी नहीं है, गालियाँ देती समधिनें नहीं हैं.?
स्नेह नहीं है, प्यार नहीं है, मनुहार नहीं है, नाई का न्योता नहीं है, व्हाट्सएप पर निमंत्रण है.
सारे पंडाल एक जैसे हैं. आप कहीं भी जाकर खाकर आ सकते हैं. ना मेजबान का पता है. ना मेहमान की खबर है. ना कोई आपको पहचानता है, ना आप किसी को जानते हैं. घूमते बेयरों के हाथ से कुछ ले लीजिए ?
बारात आई नहीं है. वरमाला हुई नहीं है. बस आपको किसी को लिफाफा थमाकर निकल जाना है.?
और तीन जगह जाना है. ? यही तो आज का जमाना है….
जेब गरम है. संगीत कानफोड़ू है. खाने में सैकड़ों वैराइटी है. बात में बात है – वहां का पनीर अच्छा था, वहां का शेक मजेदार था…?
क्योंकि दूल्हा और दुल्हन को तो देखा ही नहीं सिर्फ खाना खाया अपना व्यवहार दिखाया और लिफाफा दिया और निकल लिये….?
यही आज का लोकाचार है
सबका यही व्यवहार है और बोल भी दिया ..आ गये यह क्या कम है ..? अरे भई !
शादियों का मौसम है।? पर यह शादी नहीं है, धन,दौलत, अंहकार,रईसी का झूठा प्रदर्शन है और आप मेहमान नहीं मात्र आमंत्रित व्यक्ति है??