डॉ. रामवीर कोरोना से भी बढ़ कर है अन्धभक्ति की यह बीमारी एक बार लग जाती है तो जीवन भर रहती है जारी। सोचा बहुत कि अन्धभक्तों की आखिर क्या
डॉ. रामवीर केवल पवन नहीं अब मन भी हो गया इतना अधिक प्रदूषित बात करें तो मुख से प्राय: वचन निकलते अतिशय दूषित। मन में विष तो और भी होगा
डॉ. रामवीर कभी भारत कृषिप्रधान देश कहा जाता था। यह पुरानी बात है। तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है और भारत एक मूर्खताप्रधान देश की
डॉ. रामवीर पचास साल पूर्व दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में एक विज्ञापन ‘रिश्ते ही रिश्ते’ दीवारों पर बहुत दिखता था। यह पहला मैरिज ब्यूरो था, शादी डॉट कॉम का
डॉ रामवीर या तो मैं कविता लिखता हूं या लिखता हूं व्यंग्य इन दो से ही मेरे दोस्त हो जाते हैं तंग। तंग हरेक नहीं होता है कुछ होते हैं
डॉ. रामवीर न काहू की चिलम भरी न गाए किसी के गीत जान बूझ कर हारे हैं हम रास न आई जीत । बाजारों से गुजरे हैं पर किया नहीं
डॉ रामवीर तेरी मुझको नहीं माननी तू ही मेरी मान दुराग्रह ही अन्धभक्तों की है असली पहचान। जो कुछ रटवा दिया है उसका कर देते हैं बखान अन्य किसी की
डॉ. रामवीर उस दिन एक दुकान पर चढ़ा तो देखा च्यवनप्राश के डिब्बे उल्टे रखे हुए हैं। उल्टे क्यों रखे हैं ? पूछने पर दुकानदार ने बताया कि भले ही
डॉ. रामवीर यूं तो ‘दो शब्द’ शीर्षक पुस्तकों की भूमिका के लिए रूढ़ हो चुका है जिसमें दो शब्द के नाम से दो हजार शब्द भी परोसे जा सकते हैं।
कुछ औरों के बारे में कुछ अपने विषय में ग़लतफ़हमियांं लोग पालते मिले शौक से तरह तरह की ग़लतफ़हमियां । ग़लतफ़हमियां भी जुकाम सी बीमारी है सबको होती इसको उसको