न काहू की चिलम भरी

न काहू की चिलम भरी
October 12 12:55 2025

डॉ. रामवीर
न काहू की चिलम भरी
न गाए किसी के गीत
जान बूझ कर हारे हैं हम
रास न आई जीत ।

बाजारों से गुजरे हैं पर
किया नहीं कुछ क्रीत
न ही कभी स्वीकारा हमने
खुद होना विक्रीत।

दुनिया में क्रय विक्रय का ही
है सब जगह नियम
किन्तु स्वाभिमानी अपने को
कैसे बेचे स्वयम् ।

अन्तरात्मा बेच के जो जन
हो गए हैं मालदार
उनके माल को दो कौड़ी का
मानते हैं खुद्दार ।

कुछ लोगों को हममें शायद
झलकता हो अभिमान
क्षमा करें बिन स्वाभिमान के
क्या नर की पहचान ।

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