डॉ. रामवीर न काहू की चिलम भरी न गाए किसी के गीत जान बूझ कर हारे हैं हम रास न आई जीत ।
बाजारों से गुजरे हैं पर किया नहीं कुछ क्रीत न ही कभी स्वीकारा हमने खुद होना विक्रीत।
दुनिया में क्रय विक्रय का ही है सब जगह नियम किन्तु स्वाभिमानी अपने को कैसे बेचे स्वयम् ।
अन्तरात्मा बेच के जो जन हो गए हैं मालदार उनके माल को दो कौड़ी का मानते हैं खुद्दार ।
कुछ लोगों को हममें शायद झलकता हो अभिमान क्षमा करें बिन स्वाभिमान के क्या नर की पहचान ।