फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भ्रष्टाचार के गढ़ नगर निगम में अदना से लेकर आला अधिकारी तक लूट कमाई में लगे रहते हैं, ऐसे में भला जेई मनोज शर्मा पीछे क्यों रहने लगा, बेशक वह ठेकेदारी में ही क्यों न हो। निगम में चर्चा है कि वह खुद तो लूट ही रहा है अपने भाई, जीजा, चाचा आदि को भी इसमें शामिल कर लिया है। उसने अपने रिश्तेदारों के नाम पर कई फर्में रजिस्टर करा रखी हैं, इन फर्मों से काम कराने का मतलब कमीशन भी अपना मुनाफा भी अपना और क्योंकि हिस्सापत्ती ऊपर तक ईमानदारी से पहुंचाई जाती है तो जांच का सवाल ही नहीं उठता। मनोज की देखादेखी कई अन्य जेई यहां तक कि एसडीओ भी अपने रिश्तेदारों के नाम पर फर्म खोलने की तैयारी कर रहे हैं।
मनोज शर्मा एचकेआरएन के तहत यानी ठेके पर जेई तैनात है। उसकी ‘प्रतिभा’ देखते हुए निगम में उसे अमृत योजना, रैनीवेल, मुख्यालय और राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम (एनकैप) का चार्ज दे रखा है। एनकैप में वायु प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर पौधरोपड़, सफाई, पानी का छिड़काव, एंटी स्मॉग गन आदि की मद में अंधाधुंध बजट मिलता है, जिसका सारा लेखा जोखा फर्जी होता है।
क्योंकि रैनीवेल जलापूर्ति जैसी संवेदनशील और अतिआवश्यक सेवा है इसलिए आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में आनन फानन समस्या सुलझाने के नाम पर लाठियों के गज से खर्चा नापा जाता है। इसीलिए बार बार बाधाएं उत्पन्न होने की गुंजाइश भी छोड़ दी जाती है। मनोज ने अपने साले सुमित शर्मा के साथ ही चाचा और ताऊ के नाम पर फर्म रजिस्टर करवा रखी हैं। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार आए दिन किसी न किसी रैनीवेल की पानी की आपूर्ति बाधित कर दी जाती है, फिर बताया जाता है कि मोटर फुक गई, या कोई अच्छी खासी रकम वाला पार्ट खराब हो गया, जिसे यदि आनन-फानन न बदला गया तो समस्या हो जाएगी।
अधिकारी तुरंत ही मोटर या पार्ट बदलने का फरमान सुनाते हैं। कागजों पर यह सारा सामान मनोज के साले, चाचा, ताऊ की फर्म से मंगाकर लगा दिया जाता है और बिल का भुगतान भी हो जाता है। यह खेल मनोज अकेला नहीं खेलता, इसमें आला अधिकारियों की भी हिस्सापत्ती तय होती है, फाइल के साथ साथ अधिकारी का भी पेट भरा हो तो कौन जांच अधिकारी किसको पकड़ेगा। पार्ट रिपेयरिंग का बिल अलग बनता है, उसमें भी बंदरबांट होती है। भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि रैनीवेल के फर्जी बिल मनोज की मोटी कमाई का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
रैनीवेल ही नहीं मुख्यालय का चार्ज होने के कारण मनोज ने यहां भी मोटी कमाई का जुगाड़ निकाल लिया है। इसके लिए उसने ड्यूटी के समय शराब पीने के जुर्म में नौकरी से निकाले गए क्लर्क लोकेश के भाई कुश को अपना पार्टनर बनाया है। हालांकि लोकेश को बाद में सिफारिश पर फिर नौकरी पर रख लिया गया था। उसके भाई कुश का नगर निगम से कोई लेना देना नहीं है बावजूद इसके वह दिन पर एक्सईएन नितिन कादियान के कार्यालय में बैठा पाया जाता है। लोकेश और मनोज का वरद्हस्त होने के कारण कुश एक्सईएन नितिन कादियान से मिलने आने वाले ठेकेदार व अन्य ‘जरूरतमंदों’ को डील करता है।
मनोज ने कुश के नाम पर बजरंगबली (बीबी) इंटरप्राइजेज नाम की फर्म बना रखी है। मुख्यालय में खेल यह होता है कि एक लाख रुपये तक के खर्च के लिए कोई टेंडर प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ती, इतने तक के कार्य सेंक्शन कर दिए जाते हैं। इंचार्ज जेई मनोज एक एक लाख रुपये से कम की 90 प्रतिशत से अधिक सेंक्शन का ऑर्डर इसी बीबी इंटरप्राइजेज को देता है। इक्का दुक्का सेंक्शन किसी दूसरी फर्म को भी दी जाती हैं ताकि जांच में केवल एक ही फर्म को काम दिया जाना साबित न हो सके। मनोज के इस खेल की जानकारी पूर्व चीफ इंजीनियर बीरेंद्र कर्दम से लेकर वर्तमान चीफ विवेक गिल, एक्सईएन नितिन कादियान और ऊपर के लगभग सभी अधिकारियों को है।
ठेके पर जेई होने के बावजूद मनोज की कमाई सबमें चर्चा का विषय है। रैनीवेल और मुख्यालय के अलावा अमृत योजना और एनकैप से भी मोटी कमाई होती है। अमृत और एनकैप योजनाएं ऐसी हैं जिनमें पर्यावरण व जल संरक्षण, वायु गुणवत्ता सुधार के नाम पर अंधाधुंध खर्च करने की छूट है, परिणाम कोई देखता भी नहीं। बताया जा रहा है कि निगम की ऊपरी कमाई से उसने सेक्टर दो में चार सौ गज जमीन में अपना नर्सिंग होम खोल लिया है, जिसका संचालन उसका भाई कर रहा है।
महज तीस पैंतीस हजार रुपये पाने वाला ठेके का जेई अधिकारियों की सहमति, शह और मिलीभगत के बिना इतने बड़े कारनामे अंजाम देने की सोच भी नहीं सकता, लेकिन जब गायत्री देवी, रवि भगत, सरदार जसवंत सिंह जैसे पार्षदों और नेताओं, मंत्रियों तक को नगर निगम की हराम कमाई की बहती गंगा में डुबकी लगानी है तो उनकी इच्छा पूरी करने के लिए अधिकारी और मनोज जैसे जेई भी हाथ धोएंगे ही।