डॉ. रामवीर बच्चों के प्रश्न होते हैं मौलिक सीधे और बेलाग जिन्हें वे कहीं भी देते हैं दाग और आप चाह कर भी नहीं सकते उनसे भाग अभी कल एक
1. पहली मई मैं बीस साल का हूं लेनिन जि़न्दा हैं लाल चौक लदा हुआ है झण्डों से और खड़े हैं कतारबद्ध पन्द्रह करोड़ लोग पैंतीस साल बीत गए मैं
( 1 ) ता उम्र मुश्किलात में कुछ इस तरह जिया जैसे कि आंधियों में भी जलता रहा दिया अर्ज़े हयात के लिए क्या क्या नहीं किया क़त्ले ज़मीर तो
डॉ. रामवीर प्यार बांटते बांटते उमर बिताई पूरी जिन पे लुटाया वे भी देखा रखने लगे हैं दूरी। हमें पता है उन बेचारों की है जो मजबूरी उनको सारी जानकारियां
हमें ज़मीन चाहिए, सारा आसमान तुम रख लो। हमें संविधान चाहिए, गीता, कुरान तुम रख लो। हमें रोटी चाहिए अध्यात्म का ज्ञान तुम रख लो। हमें रोजगार चाहिए व्रत और
डॉ. रामवीर हम तो सदा कहते आए हैं दोहरा रहे पुन: देश के माथे पर कलंक है पारस्परिक कलह। अगर चाहते हो सुख चैन न भूलें ये बैन ‘ईवन वार्स
डॉ. रामवीर नेता हों या होवें पुजारी सब के सब हो गए व्यापारी, राजनीति में और धर्म में घुसे हुए हैं कारोबारी। नेताओं को नहीं दीखती बेबस जनता की लाचारी,
डॉ. रामवीर समझाने वाले ज्यादा हैं और समझने वाले कम, इस हालत में दिल की बातें कैसे किसे सुनाएं हम। अब संवाद नहीं होता है बहस वास्ते ठोकें खम, लगता
जिन्होंने नफऱत फैलाई, क़त्ल किए और ख़ुद ख़त्म हो गए, नफऱत से याद किए जाते हैं। जिन्होंने मुहब्बत का सबक़ दिया और क़दम बढ़ाए वे जिन्दा हैं, मुहब्बत से याद
देश जा रहा है सेठों की जेब मे देश जा रहा है सेठों की जेब में समाधान ढूंढते हो औरंगजेब में बेटियां लाचार बनाते हो घर में सुरक्षा चूक खोजते