राजनेताओं की विश्वसनीयता नहीं बची तो उपायुक्त के नाम से घोषणाएं होने लगीं

राजनेताओं की विश्वसनीयता नहीं बची तो उपायुक्त के नाम से घोषणाएं होने लगीं
November 17 13:42 2024

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते दसियों वर्ष से भाजपाई राजनेताओं ने जनता को बेवकूफ बनाने के लिए जिस तरह से थोथी घोषणाओं की झड़ी लगाए रखी, उससे इनकी विश्वसनीयता रसातल में जा पहुंची है। लगता है सरकार ने इस बात को समझ लिया है। इसी के मद्देनज़र अब फरीदाबाद में होने वाले तथाकथित विकास कार्यों की घोषणाओं में उपायुक्त विक्रम सिंह का नाम इस्तेमाल किया जाने लगा है।

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि शहर में जाम-मुक्त यातायात को बनाने के लिए कहीं ईस्ट-वेस्ट तो कहीं एफएनजी परियोजना तो कहीं विभिन्न प्रकार के फ्लाईओवरों को बनाये जाने के प्रस्ताव उपायुक्त के माध्यम से घोषित कराए जा रहे हैं। किसी में 637 करोड़ तो किसी में 2000 करोड़ तो किसी में और बड़ी रकमों का चर्चा किया जा रहा है। ये तमाम घोषणाएं पिछले काफी समय से राजनेता करते आ रहें हैं। नई-नई घोषणाएं तो आए दिन हो रही हैं परन्तु पहले से घोषित मेट्रो रेल न तो पलवल पहुंची और न ही गुडग़ांव। मोहना रोड का फ्लाईओवर का ड्रामा कागजों में ही है, सोहना रोड का रेलवे फ्लाईओवर बीते कई वर्षों से फाइलों में ही निर्माणाधीन चल रहा है। सेक्टर 16ए का राजकीय महाविद्यालय का भवन आधा अधूरा बना खड़ा है। मंझावली यमुना पुल की तो अब बात ही क्या करनी रह गई।

सैंकड़ों-हज़ारों करोड़ के प्रोजेक्टों की घोषणाएं करके सरकार जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से ध्यान भटकाना चाहती है। जाम से मुक्ति के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्टों की भूल-भुलैया तो सरकार खड़ी कर सकती है लेकिन इसके लिए आवश्यक छोटेे-छोटे काम करने की जरूरत इन्हें समझ नहीं आती। सर्विस लेन पर हो रही पार्किंग व अवैध कब्जे इन्हें नज़र नहीं आते। किसी भी लाल बत्ती पर स्लिप-रोड बनाने की बात इनकी समझ से दूर है। अजरौंदा चौक पर, थॉंमसन प्रेस से लेकर अजरोंदा मोड़ तक सर्विस लेन बनाने की बात समझने में प्रशासन को बीसियों वर्ष लग गए। लेन तो बन गई लेकिन इस पर जगह-जगह पर हो रहे कब्ज़े प्रशासन को नज़र नहीं आते। सड़कों पर, खास कर बाटा व बडख़ल फ्लाईओवरों पर बढ़ते गड्ढे भरने की बजाय इन पुलों के क्षतिग्रस्त होने का इंतजार किया जा रहा है।

उपायुक्त विक्रम सिंह हों या कोई और, केवल कुछ समय के लिए ही तैनाती पर आते हैं। इसलिए उनके तबादले के बाद उनकी कही गई बात भी आई-गई हो जाती हैं ऐसे में वे किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं बन पाते, जबकि राजनेता स्थायी तौर पर या कहें तो पांच साल के लिए तो सत्ता में रहते ही हैं। जनता उनसे सवाल पूछ सकती है। अपनी इस जवाबदेही से बचने के लिए शायद नेतागण उपायुक्त को आगे कर रहे हैं। संदर्भवश उपायुक्त विक्रम सिंह ने यहां तैनात होते ही बडख़ल झील का स्वयं व्यक्तिगत रूप से सर्वे करके इसे बरसाती पानी से ही भरवाने की बात कही थी। लेकिन राजनेताओं को मुफ्त में होने वाला यह बढिय़ा काम समझ में नहीं आया। समझ में आता भी कैसे, जब तक 100-200 करोड़ का बजट एवं टेंडर न बने तो नेताओं व उच्चाधिकारियों के पल्ले पड़ेगा ही क्या। इसलिए सैंकड़ों करोड़ का बजट बना कर इस झील को सीवर के गंदे पानी से भरने का प्रयास किया गया और वह भी असफल रहा।

उपायुक्त का नाम तो इस्तेमाल किया जा रहा है इन तथाकथित विकास कार्यों के लिए लेकिन वास्तव में इनसे संबंधित कोई भी अधिकार उनके पास नहीं है। अधिकार सारे के सारे एफएमडीए, पीडब्ल्यूडी अथवा नगर निगम के पास हैं इन सभी एजेंसियों का नियंत्रण एवं बजट प्रक्रिया चंडीगढ़ में बैठे उच्चाधिकारियों व मंत्रियों द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। उपायुक्त को कोई अधिकार नहीं है कि निर्माण कार्यों के नाम पर डकैती मारने वाले इंजीनियरों ठेकेदारों व अधिकारियों के खिलाफ सीध तौर पर कोई कार्रवाई कर सके।

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Mazdoor Morcha
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