वायु क्लब आए परिवार पर पुलिस की शह से गुंडों का हमला कान में लगा हीरा व बटुए से 22,000 रुपये लूटे व दौड़ा-दौड़ा कर पीटा

वायु क्लब आए परिवार पर पुलिस की शह से गुंडों का हमला कान में लगा हीरा व बटुए से 22,000 रुपये लूटे व दौड़ा-दौड़ा कर पीटा
April 04 06:09 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नहरपार सेक्टर 70 स्थित वायु क्लब में जन्मदिन मनाने को रमन ग्रोवर ने अपने परिवार के लिए 26 मार्च को बुकिंग कराई थी। इनमें कनाडा से आई उनकी बेटी भी थी। जैसे ही परिवार वालों ने नाच-गाने की शुरुआत की, क्लब में ही मौजूद करीब दस-बारह नशेड़ी जो वहां बजरिया नाक नशीली ड्रग्स की डोज ले रहे थे, सक्रिय हो गए। उनका सरगना क्लब मालिक का बेटा रिशित चितकारा था। डीजे पर बजने वाले गाने को लेकर नशेड़ी गिरोह पार्टी में आए लोगों से तकरार करने के बाद हाथापाई पर उतर आया। कनाडा से आई बेटी ने तुरंत पापा रमन ग्रोवर को फोन किया तो वे भी मौके पर पहुंच गए। उन्होंने स्थिति को संभालने का प्रयास किया तो, कानून-कायदों से बेपरवाह नशेड़ी गुंडे उनसे भी लिपट गए और उनके कान में जड़ा 2 कैरेट का हीरा छीनने के लिए उनका कान ही फाड़ दिया तथा उनके बटुए से 22,000 रुपये भी छीन लिए। इतना ही नहीं उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, महिलाओं को निर्वस्त्र करने का भी प्रयास किया।

इस सारी वारदात के दौरान परिजनों ने पूरी घटनाक्रम की वीडियो भी बना ली थी, जिसमें गुंडे अपनी गुंडागर्दी करते साफ दिख रहे हैं। ग्रोवर ने पुलिस को 112 पर फोन किया तो थाना बीपीटीपी पुलिस मौके पर पहुंच गई। ग्रोवर की शिकायत पर थाना बीपीटीपी पुलिस ने बीएनएस की धाराएं 115,126, 190,191(2) और 151(2) के तहत मुकदमा नंबर 58 तो दर्ज कर लिया, लेकिन गिरफ्तारी के नाम पर केवल दो लोगों को गिरफ्तार करके तुरंत जमानत पर छोड़ दिया। पुलिस ने इन गुंडों का मेडिकल परीक्षण भी नहीं करवाया, जिससे इनके नशे में धुत्त होने के सुबूत खत्म हो गए। शिकायतकर्ताओं के एतराज करने पर थाना प्रभारी अरविंद ने कहा कि यह उसकी पावर है, किसी को हवालात में बंद करे या जमानत पर छोड़ दे, यह भी उसकी पावर है कि केवल दो को ही गिरफ्तार करे अथवा सभी दस-बारह आरोपियों को गिरफ्तार करे।

थाना प्रभारी का रवैया स्पष्ट बता रहा था कि वह आरोपी वायु क्लब वालों के हाथों बिका हुआ है। वैसे ये बात भी किसी से छुपी नहीं है कि इस तरह के क्लब चलाने वाले, होटल चलाने वाले तथा शराब का धंधा करने वाले अनिवार्य रूप से पुलिस की नियमित सेवा-पानी करते रहते हैं। ऐसे में पुलिस से कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह ऐसे गुंडों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई कर पाएगी। खानापूर्ति के लिए पुलिस ने पीडि़तों का डॉक्टरी मुआयना कराकर एफआईआर दर्ज करने की औपचारिकता इस ढंग से पूरी कर दी कि गुंडागर्दी करने वालों का कुछ भी न बिगड़ सके। थाना प्रभारी का लचर रवैया देखते हुए शिकायतकर्ता ग्रोवर ने किसी तरह डीजीपी हरियाणा अजय सिंघल से संपर्क साध कर अपनी व्यथा कथा बताई तो उन्होंने कहा कि मैंने सीपी पुलिस आयुक्त से कह दिया है आप उनसे मिल लीजिए। सारा पीडि़त परिवार सीपी से मिलने पहुंचा तो उन्होंने कहा कि एसएचओ ने कानून सम्मत ठीक कार्रवाई की है और उचित धाराएं भी लगाई हैं फिर भी यदि आप लोग थाने की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं तो तफ्तीश जिसको कहो उसके पास भेज देते हैं। देखा जाए तो सीपी का यह जवाब किसी तरह से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता, पीडि़त परिवार जैसे साधारण लोगों के लिए सभी पुलिस एक जैसी होती है, और वे कैसे बता सकते हैं कि कौन बेहतर तफ्तीश करेगा। एसएचओ की कार्रवाई को सीपी द्वारा उचित ठहराना किसी तरह भी वाजिब नहीं लगता। खुद सीपी साहब ही सोचें यदि उनके परिजनों के साथ भी इसी तरह की गुंडागर्दी हो गई होती तो भी क्या वे एसएचओ की कार्रवाई को उचित ही ठहराते?

गौरतलब है कि एसएचओ ने तमाम मामूली जमानती धाराओं में ही मुकदमा दर्ज किया था। आरोपियों को बचाने के लिए न तो महिला विरुद्ध किए गए अपराध की गैर जमानती धाराएं लगाई गईं और न ही ग्रोवर का कान फाड़ कर दो कैरेट का हीरा छीनने की गैर जमानती धारा। समझने वाली बात यह भी है कि इस तरह के अपराधी प्रवृत्ति के लोग धाराओं से कम ही डरते हैं उन्हें डर होता है तो केवल पुलिस की आंख से बरसने वाले गुस्से का, जिन अपराधियों की पुलिस से प्यार मोहब्बत होती है अथवा लेनदेन चलता रहता है उन्हें इन जमानती धाराओं का कोई खौफ नहीं होता। विदित है कि इस क्लब के पास बार का लाइसेंस न होने के बावजूद यहां शराब पिलाई जाती है तो किसके दम पर? जाहिर है पुलिस के दम पर, और इसी आसरे ड्रग्स का कारोबार भी यहां ठीक-ठाक चल पाता है। नियमानुसार तो इस तरह के क्लबों में सीसीटीवी कैमरों का होना अनिवार्य है जो कि यहां पर नहीं लगाए गए, इसका भी पुलिस ने कभी कोई संज्ञान नहीं लिया।

अब क्योंकि मामला डीजी साहब तक भी पहुंच चुका था लिहाजा सीपी ने यह केस क्राइम ब्रांच बीपीटीपी चौकी को सौंप दिया है। समझने वाली बात यह भी है कि जिस एसएचओ की कार्रवाई को स्वयं सीपी साहब उचित और कानूनी ठहरा चुके हों उसके विरुद्ध भला क्राइम ब्रांच वाले कैसे जा सकते हैं लिहाजा वे भी कागजी खानापूरी करके मामले को जैसे तैसे घुमा फिरा कर ‘राजीनामे’ अथवा समझौते की ओर लाने में अपना फर्ज निभाएंगे। दूसरी ओर एसएचओ अरविंद आग में घी डालने बाज आने को तैयार नहीं, सीपी से मिलकर आने के बाद परिजनों को उसने तंजिया लहजे में कहा, कर ली मेरी शिकायत, पाड़ ली मेरी पूंछ? यह केवल माहौल को बिगाडऩे तथा पुलिस की बदनामी करने का भी काम हो सकता है।

जाहिर है इस तरह का व्यवहार जनता के मन में पुलिस के प्रति नफरत और अविश्वसनीयता ही भर सकता है। इससे जहां गुंडागर्दी करने वाले बेखौफ होकर अपना आतंक फैलाएंगे, वहीं आम लोग पुलिस के पास जाने से भी गुरेज करेंगे। इस मामले में सबसे गंभीर बिंदु कनाडा से आई महिला का है, वह यहां से अपने देश विशेषकर फरीदाबाद पुलिस के बारे में कैसे विचार लेकर जाएगी। विदेशों में भी इससे अकेले थाना प्रभारी की नहीं बल्कि आईजी रैंक के सीपी तथा डीजीपी के लिए भी शर्मनाक स्थिति ही बनेगी। इस मामले में थाने के ही विशेष भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है कि एक एएसआई ने शिकायतकर्ता से पच्चीस हजार रुपये लेकर उसे ये आश्वासन दिया था कि केस को मजबूत करवा देगा और उसी के कहने पर एफआईआर में 22 हजार रुपये का जि़क्र किया गया था। लेने वाला एएसआई तो क्यों ही कुबूल करेगा, मजे की बात तो यह है कि खौफज़़दा शिकायतकर्ता भी यह कहने कि हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कि उसने यह पैसे एएसआई को दिए थे। पुलिस का यह तमाशा तो मात्र एक हांडी के चावल की तरह का उदाहरण है, वास्तव में न केवल इस जिले में बल्कि राज्य भर में लगभग यही सब कुछ हो रहा है जिसे देखने और समझने में न तो किसी सीपी की रुचि है और न ही डीजीपी की।

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Mazdoor Morcha
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