पत्रकारिता का अंधा युग-11

पत्रकारिता का अंधा युग-11
February 13 10:41 2026

राजसत्ता, माओवाद और पत्रकारिता (आनन्द स्वरूप वर्मा)
पिछले कुछ वर्षों से बहुत सुनियोजित ढंग से यह प्रचार चलाया जा रहा है कि कानूनी प्रक्रिया इतनी दोषपूर्ण है कि अब इसका सहारा लेकर अपराधियों से नहीं निपटा जा सकता। मजे की बात यह है कि यह प्रचार उन्हीं पार्टियों द्वारा किया जा रहा है जिनके नेता खुद इस प्रक्रिया का लाभ उठा कर सीना ताने घूम रहे हैं। इस सिलसिले में कुछ अति महत्त्वपूर्ण और जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं के बयान चौंकाने वाले हैं। 20 अप्रैल, 1998 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक बुलायी थी। उस बैठक में दिये गये उनके वक्तव्य का यह अंश गौर करने लायक है- ‘दो-तीन बातों की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

नंबर एक- गिरोहों और गैंग का चिह्नीकरण और कुल लक्ष्य निर्धारित करके उनका लिक्वीडेशन… हमारा अभियोजन पक्ष भी मजबूत होना चाहिए… आपको हमारी ओर से लिबर्टी चाहिए, हम देने को तैयार हैं। हमें परफारमेंस चाहिए, परिणाम चाहिए, दुनिया मेरी और आपकी परिस्थितियों को बाद में देखेगी, पहले परिणाम देखना चाहेगी। आज की बैठक में यहाँ से संकल्प लेकर जा रहे हैं कि 15 मई तक हम धमक पैदा कर देंगे। कुछ इस किस्म के नामी गिरामी अपराधियों के साथ मुठभेड़ में, अगर इनकाउंटर में वे लिक्वीडेट हो जाते हैं दैन डू इट… ‘। इसके दो महीने बाद 29 जून, 1998 को उत्तर प्रदेश विधान सभा में कल्याण सिंह ने अपने एक वक्तव्य में कहा- ‘श्रीमन आपको पता है, मैं बता चुका हूँ कि 10 बड़े-बड़े माफियाओं का चिह्नीकरण कर लिया गया है, टास्क फोर्स बन गयी है, उसमें जांबाज नौजवान और अधिकारी हैं, उनके लिक्वीडेशन के लिए कसम खाकर हमारे जवान लगे हुए हैं…। ‘

1 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस को निर्देश दिया कि ‘अगर वे एक मारें तो आप चार मारें।’ राजनाथ सिंह की इस घोषणा से उत्साहित होकर 9 मार्च, 2001 को मिर्जापुर के भवानीपुर गाँव में 16 दलितों, खेत मजदूरों और छात्रों को पुलिस ने नक्सलवादी बता कर मार डाला। इस तथाकथित मुठभेड़ में कक्षा सात और कक्षा नौ के दो विद्यार्थियों क्रमश: हरिनारायण और सुरेश को भी पुलिस ने मार गिराया। इसके बाद पुलिस ने यह प्रचारित किया कि सुरेश नामक जो व्यक्ति मारा गया है वह कुख्यात अपराधी सुरेश बियार है। 14 मार्च को इस फर्जी मुठभेड़ के विरोध में मिर्जापुर कचहरी में एक सभा हुई जिसमें सुरेश बियार को लोगों ने मंच पर बुला कर जनता को दिखाया और पुलिस की इस तथाकथित मुठभेड़ का पर्दाफाश हो गया। इस जघन्य हत्याकांड को जायज ठहराने के लिए राजनाथ सिंह ने हत्यारे पुलिसकर्मियों को लाखों रुपये के पुरस्कार दिये और उन्हें पदोन्नतियाँ दीं।

उपरोक्त बयान भाजपा नेताओं के थे। लेकिन अगर कोई मार्क्सवादी भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करे तो आप क्या कहेंगे? पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कोलकाता में दो नये पुलिस थानों का उद्घाटन करते हुए 25 दिसंबर, 2000 को अपने भाषण में पुलिस को सलाह दी कि वह ‘सरकार द्वारा दी गयी बंदूकों का खुल कर इस्तेमाल करे।’ उन्होंने आगे कहा- ‘जरूरत पड़े तो गोली मार दो-मानव अधिकारों की चिंता मत करो। मैं आगे देख लूंगा।’ उनके इस बयान के बाद अखबारों में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल के एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि राज्य का मानव अधिकार संगठन अपराधियों के अधिकारों को हिफाजत देने वाला संगठन है।

2 सितंबर, 2001 को तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने घोषणा की कि ‘आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले सुरक्षाकर्मियों को संविधान के दायरे में रख कर राहत प्रदान करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।’ उनकी इस घोषणा से पंजाब पुलिस के उन लगभग 700 जवानों को राहत मिलने की उम्मीद हुई जिनके खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के मामले दर्ज थे। इस संदर्भ में पंजाब में अकाली दल की मानव अधिकार शाखा के अध्यक्ष जसवंत सिंह कालड़ा के मामले को याद किया जा सकता है जिन्होंने 1995 में काफी दौड़-धूप करने के बाद ऐसे हजारों लोगों के सामूहिक तौर पर किये गये दाह संस्कार का मामला उजागर किया था जिन्हें पुलिस ने अपने रजिस्टर में ‘अज्ञात’ घोषित कर रखा था। पुलिस ने अपनी डायरी में यह दिखाया कि इन लाशों को क्लेम करने वाला कोई नहीं था। पंजाब उच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में दायर की गयी एक याचिका को ‘बेहद अस्पष्ट’ कहते हुए खारिज कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद कालड़ा के खिलाफ पंजाब पुलिस हाथ धोकर पड़ गयी। 6 सितंबर, 1995 को पंजाब पुलिस के कुछ कमांडो सादी वर्दी में कालड़ा के घर पहुँचे और उन्हें वहाँ से उठा लिया। उस समय से आज तक कालड़ा का कोई पता नहीं है। कालड़ा के साथियों और सहकर्मियों द्वारा दिये गये हलफनामे के अनुसार तरन तारण जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजीत सिंह संधू की ओर से कालड़ा को लगातार धमकियाँ मिल रही थीं। हलफनामा देने वालों में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहडा, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अजीत सिंह बेस, मानव अधिकारवादी जसपाल सिंह ढिल्लों आदि थे। सीबीआई ने अपनी जाँच के बाद तरन तारण के एसएसपी अजित सिंह संधू के अधीनस्थ अफसरों को कालड़ा के अपहरण के लिए जिम्मेदार ठहराया। समूचे कांड के मुख्य अभियुक्त और के.पी.एस. गिल के ‘आतंकवाद विरोधी मुहिम के घनिष्ठ योद्धा’ तरन तारण के एसएसपी अजित सिंह संधू को जब लगा कि अब वह भी चपेट में आने वाले हैं तो उन्होंने चलती ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली।

इसके बाद तो के.पी.एस. गिल मानव अधिकार संगठनों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये। गिल ही नहीं, अनेक बुद्धिजीवियों ने भी अखबारों के जरिये अपने इन विचारों को व्यक्त किया जिससे यही निष्कर्ष निकलता था कि मानव अधिकार संगठनों की वजह से आतंकवाद पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए कुछ ने तो यहाँ तक राय व्यक्त कर दी कि ‘अपराधों’ से निबटने के लिए अदालत की मदद लेना बेकार है क्योंकि कानूनी प्रक्रिया बेहद लंबी है, इसमें अनेक ऐसे सुराख हैं जिनसे होकर अपराधी निकल जाते हैं। लिहाजा इन्हें देखते ही गोली मार देनी चाहिए। के.पी.एस. गिल और अजित सिंह संधू की यह अवधारणा किस तरह राजनेताओं से होते हुए बुद्धिजीवियों और मीडिया तक पहुँची तथा अब यह धीरे-धीरे आम आदमी के मन मस्तिष्क में घर करती जा रही है-यह एक समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय है। अदालतों में किस कदर भ्रष्टाचार व्याप्त है और उसका निवारण कैसे किया जाए अथवा अदालती प्रक्रिया को कैसे आसान बनाया जाए ताकि फैसले जल्द से जल्द हों, इस पर विचार न करके इस समूची प्रक्रिया को नकारने की ही अवधारणा स्थापित होने लगी। इस आलेख के प्रारंभ में कल्याण सिंह के विधानसभा वाले बयान का विरोध करते हुए जब उत्तर प्रदेश पीयूसीएल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की तो अदालत ने उसे अनेक तकनीकी कारणों के आधार पर खारिज कर दिया। अदालत ने एक दिलचस्प बात यह कही कि ‘हो सकता है कि कल्याण सिंह को अँग्रेजी के लिक्वीडेशन शब्द का अर्थ न मालूम हो।’ जहाँ न्यायपालिका ऐसी हास्यास्पद स्थिति में उपस्थित हो रही हो वहाँ न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

उन दिनों समय-समय पर दिये गये अपने वक्तव्यों में गृहमंत्री आडवाणी ने जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में काम कर रहे सुरक्षाकर्मियों की दिक्कतों को विशेष रूप से रेखांकित किया। आतंकवाद से निबटने के लिए जायज नाजायज हर तरीके का इस्तेमाल करने की दलील देने वाले गिल को आडवाणी की इस घोषणा से काफी राहत मिली। लेकिन जम्मू कश्मीर जैसे ‘अशांत’ क्षेत्रों की जनता ने क्या महसूस किया होगा जिसे हर रोज पुलिस और सेना की ज्यादतियों का सामना करना पड़ता है। गिल और उनके समर्थक छत्तीसिंह पीरा जैसी घटनाओं को कभी-कभार होने वाली भूल कह कर पल्ला झाड़ सकते हैं लेकिन जनता इसे भूल नहीं मानती। जरा हम एक बार छत्तीसिंह पीरा की घटना को याद कर लें। अब से कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत पहुँचने ही वाले थे कि 20 मार्च, 2000 को कश्मीर में छत्तीसिंह पीरा में सिखों के नरसंहार की दर्दनाक घटना हुई। सरकार की ओर से तुरंत बयान जारी हुआ और कहा गया कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने यह हत्याकांड किया है। फिर 25 मार्च को अचानक पुलिस और सेना के कुछ जवानों ने अनंतनाग जिले में एक मुठभेड़ के दौरान पाँच लोगों को मार गिराया और कहा कि ये वही विदेशी आतंकवादी थे जिन्होंने 20 मार्च को छत्तीसिंह पीरा में सिखों की हत्या की थी। इनकी अधजली लाशों को सैनिकों ने दफना दिया। अखबारों ने सुरक्षा बलों की कामयाबी की प्रशंसा की।

लेकिन मामला कुछ और था। गाँव वालों का कहना था कि सुरक्षा बलों ने जिन्हें विदेशी और आतंकवादी बता कर मारा है वे तो उनके गाँव के सीधे-साधे लोग थे जिनका आतंकवाद से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। गाँव वालों का कहना था कि मारे गये लोगों के शवों को कब्र से निकाला जाए और उनकी डीएनए जाँच करायी जाए ताकि पता चल सके कि वे विदेशी थे या कश्मीरी। 26 मार्च से ही इस माँग को लेकर गाँव वाले धरने पर बैठे रहे और जब प्रशासन ने कोई सुनवायी नहीं की तो उन्होंने प्रदर्शन शुरू किया। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोली चलायी जिसमें सात लोग मारे गये। 5 अप्रैल को सरकारी तौर पर आदेश जारी हुआ कि लाशों को कब्रों से निकाला जाए और उनके डीएनए की जाँच की जाए। 6 अप्रैल को परिवारजनों ने उन लाशों की शिनाख्त की और साबित हुआ कि सुरक्षा बलों ने आतंकवादियों की नहीं बल्कि निर्दोष नागरिकों की हत्या की थी। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ी घटना है हालाँकि आतंकवाद से निबटने के नाम पर 1970 के दशक के पश्चिम बंगाल से लेकर कल तक के पंजाब और आज के उत्तर पूर्व राज्यों में यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है। अनंतनाग में पहली बार जनमत के दबाव के कारण घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि सरकारी एजेंसियाँ कटघरे में खड़ी दिखायी दीं। क्रमश:

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Mazdoor Morcha
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