अनूप चौधरी चंडीगढ़। लोकसभा के शीतकालीन सत्र में आरएसएस और भाजपा के जहरीली सड़ांध से भरे बंद गटर का ढक्कन गृहमंत्री अमित शाह ने हटाया तो चौतरफा जहरीली गैस का गुबार फैल गया। संदन और संसद के भीतर- बाहर आम ओ खास लोग अद्र्ध बेहोशी की हालत जैसे सुन्न हो गये।
सांप्रदायिक, संविधान विरोधी, दलितों और महिलाओं को मनुस्मृति के मुताबिक हांकने के मंसूबे को 99 साल से पाले बैठे आरएसएस और भाजपा ने संसद में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को निशाने पर लेकर अपनी संविधान विरोधी सोच को बल दिया। मनुस्मृति के पैरवीकारों ने अपनी मंशा बता दी। गौरतलब यह है कि संविधान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के अपमान के लिए माफी मांगने की बजाय प्रधानमंत्री से लेकर आरएसएस के तथाकथित राष्ट्रभक्त खुल कर अमित शाह के बचाव में आ गए।
संविधान और बाबा साहेब के अपमान को लेकर दलितों, पिछड़ों और महिलाओं मेंं नाराजगी व आक्रोश है। भाजपा और आरएसएस की संविधान और दलित विरोधी सोच के खिलाफ दिन-ब-दिन आक्रोश बढ़ता जा रहा है। हालांकि भाजपा और आरएसएस लोगों का ध्यान भटकाने के लिए आये दिन नए-नए आधारहीन मुद्दे ला रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आरएसएस ने आजादी से पहले और बाद में डॉ. आंबेडकर का कितना विरोध किया था। भाजपा और आरएसएस जो कहते है करते उसका उल्टा है। आप ने कभी सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में कभी कोई भूमिका इन की देखी है? हां, देश के सभी प्रदेशों में आपसी सौहार्द बिगाडऩे में अग्रणी भूमिका में रहे हैं। गांव के निश्छल प्रेम-प्यार और आपसी भाईचारे का माहौल पहली बार इन्होंने खराब किया है।
हालांकि आरएसएस अपने सौ साल पूरा होने के मौके पर गटर से ढक्कन हटाना चाहती थी पर अमित शाह संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर विरोधी होने का श्रेय खुद ले उड़े। यह कोई अचानक नहीं हुआ अमित शाह ने अपनी सोची समझी रणनीति के तहत ऐसा किया। यह दीगर बात है कि उन्होंने आरएसएस की कलई समय से पहले खोल दी। आरएसएस के संस्थापक ने अपना एजेंडा पहले ही दिन से तय किया हुआ था। 99 साल से आरएसएस इन मुद्दों को दबाए बैठा था और गाहे-बगाहे जहरीलापन व कुंठा की गैस निकाली जाती थी जिसे लीपापोती के बाद दबा दिया जाता था।
पर अब तो सार्वजनिक तौर सब कुछ खुल कर सामने आ गया है। जो लोग मुगालते और भ्रम में थे वो भी अचंभित हैं। अजब-गजब बात यह है कि भाजपा और आरएसएस इसके बाद भी फं्रट फुट पर खेल रहे हैं और इंडिया गठबंधन या विपक्ष बैक फुट पर है। इंडिया गठबंधन अभी तक जनाक्रोश को आंदोलन में बदलने में धीमी गति से चल रहा है। दिल्ली चुनाव और शीतलहर के चलते भी इस आंदोलन में सक्रियता कम होगी।
विपक्ष को महिलाओं को सक्रिय करना होगा। याद रहे दुनिया में एक मात्र भारतीय संविधान ऐसा है जिसमें में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सबसे पहले महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया। यही नहीं मतदान का हक दिया। वरना मनु स्मृति का तो मूल सिद्धांत और नजरिया आज भी नहीं बदला है। ढोल,गंवार शूद्र,पशु और नारी, ये सब ताडऩ के अधिकारी।