मजदूर मोर्चा ब्यूरो रेल मोर्ग हो या सड़क या फिर वायु मार्ग हो अथवा जल मार्ग, सभी पर सरकार का एकाधिकार है। सरकार की अनुमति के बगैर नागरिक किसी भी मार्ग का इस्तेमाल नहीं कर सकते। रेल मार्ग तो पूरी तरह से सरकार द्वारा निर्मित, नियंत्रित एवं संचालित है। किसी जमाने में इसी रेलवे विभाग द्वारा मोटा मुनाफा कमा कर राष्ट्रीय परियोजनाओं में लगाया जाता था। लेकिन ज्यों-ज्यों भ्रष्टाचार द्वारा लूट की नई-नई सीमाएं पार होने लगी त्यों-त्यों विभाग का मुनाफा घाटे में बदलने लगा। बेशक यह काम कांग्रेस राज में ही शुरू हो गया था लेकिन 2014 के बाद भाजपा शासनकाल में तो लूट का नाच बिल्कुल नंगई पर उतर आया।एक-एक करके रेलवे स्टेशन बेचे जाने लगे, निजी रेल चलाने का मार्ग प्रशस्त किया जाने लगा, कमाई वाले रूट निजी व्यापारियों को दिए जाने लगे। यात्री व मालभाड़े में बेतहाशा वृद्धि किए जाने के बावजूद विभाग का घाटा बढ़ता ही चला गया। स्टा$फ की भारी कमी तथा सुरक्षा उपकरणों का खर्च बचाने के चलते दुर्घटनाओं की भरमार होने लगी। सैंकड़ों मौतें होने के बावजूद किसी की कोई जवाबदेही नहीं होती। कोरोना के बाद से तो हालात बहुत ही खराब कर दिए गए। रेल सेवाएं बंद कर दिए जाने के चलते बड़ी संख्या में बच्चों, बूढ़ों व महिलाओं सहित जनता को सैंकड़ों हजारों मीटर की यात्रा पैदल ही तय करनी पड़ी। जब रेल सेवा शुरू भी की तो बदइंतजामी इतनी कि जाना था गोरखपुर और पहुंच गए रांची।
कोरोना के बाद जो रेल सेवा शुरू भी की तो उसके किराए बेतहाशा बढ़ा दिए गए। इसके लिए तरकीब यह अपनाई गई कि साधारण शटल एवं पैसेंजर गाडिय़ों पर ‘स्पेशल’ का फट्टा लगा कर किराया डबल कर दिया गया। इतना ही नहीं रेल सेवाओं की संख्या घटा कर आधी से भी कम कर दी गई। मजबूरन सवारियां इन्हीं आधी सेवाओं में भूसे की तरह लद कर आवागमन करने लगी। इससे जहां एक ओर परिचालन खर्च आधा रह गया वहीं आमदनी ज्यों की त्यों बनी रही। जो सवारियां भूसे की तरह लदने में असमर्थ रहती है वे दोगुना-चौगुना किराया खर्च के मेट्रो अथवा अन्य साधनों से आवागमन करते हैं।
सड़क मार्ग पर भी पूरा नियंत्रण विभिन्न राज्य सरकारों का रहता है। इसके चलते लगभग सभी राज्यों ने अपने-अपने परिवहन उपक्रम तो बना ही रखे हैं साथ में निजी वाहनों को परमिट जारी करके भी सरकारें मोटी कमाई करती है। इसके साथ-साथ सरकारी अधिकारी एवं राजनेता मिल कर बिना परमिट की बसें चला कर अंधी लूट कमाई भी करते हैं। रेल सेवा में भारी कटौती के चलते दिल्ली से बिहार के मधुबनी, मुज्जफरपुर, पटना, पूर्णियां आदि तक का सफर लोगों को बसों से करना पड़ रहा है। इन बसों में, मुनाफाखोरी के चलते क्षमता से कहीं अधिक सवारियों को ठूंसा जाता है। आजकल जैसे त्योहारी मौसम में सवारियों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाने के चलते इन बसों के भाड़े जो पहले 1000-1200 तक होते थे अब 2000-2500 तक हो गए हैं। आवागमन की इस लूट का शिकार समाज के सबसे निचले तबके को होना पड़ता है क्योंकि उच्च तबके के लोग वायु-मार्ग के अलावा राजधानी तथा वंदे भारत जैसी महंगी ट्रेनों से भी सुविधा पूर्वक यात्रा कर सकते हैं। रेल यात्री बताते हैं कि मोदी सरकार ने अनेकों बढिय़ा एवं सस्ती ट्रेनों को बंद करके अथवा उनका टाइम बदल कर दोगुने भारे वाली ट्रेनों को चला दिया है।
समझने वाली बात यह है कि यात्रियों के लिए आवागमन को मुसीबत एवं दुखदायी बनाने के लिए केवल सरकार ही पूर्णतया जिम्मेदार है। रेल अथवा बस सेवाएं चला कर सरकार जनता पर कोई एहसान नहंी कर रही। इन सेवाओं से सरकार के साथ-साथ इसके अफसरों व लगुओं-भगुओं को भी मोटी लूट कमाई होती है। एक जमाना वह भी था जब रेलवे स्टेशन पर जाकर आसानी से कहीं का भी टिकट लेकर यात्रा करने में कोई असुविधा नहीं होती थी। रिर्जवेशन का कोई चक्कर नहीं होता था। इसके बावजूद भी रेलवे मुनाफे में चलता था। चार-चार महीने पहले पूरा किराया चुकाने के बावजूद भी बैठने भर को भी सीट नहीं मिलती। इतना ही नहीं चार महीने के ब्याज खा चुकने के बाद रिफंड देते वक्त भी अच्छी-खासी कटौती कर लेते हैं। ‘तत्काल’ बुकिंग में तो और भी जुल्म है कि दोगुना भाड़ा लेने के बावजूद ट्रेन रद्द हो जाने अथवा सीट न मिलने पर रिफंड भी नहीं मिलता। इतनी लूट के बाद फिर भी घाटा। यदि सरकार की नीयत जनविरोधी न होकर जनहितैषी होती तो न ही ट्रेनों की कोई कमी होती और न ही बसों की।