हेमंत कुमार झा जिस दिन नीतीश कुमार नाम का राजनीतिक दीया, जिसकी लौ अब मद्धिम हो चुकी है, बुझ जाएगा और भाजपा नामक दीये से बिहार की सत्ता रौशन होगी उस दिन हम ऐसा बिहार देख सकते हैं जहां सबसे अधिक खतरे में बिहारीपन ही होगा। बिहारीपन…जो इस समाज को सांप्रदायिक होने से बचाता है, जो यहां की सरकारों द्वारा कानून और संस्थाओं के संचालन में सांप्रदायिक आग्रहों को उस तरह जगह नहीं देता जैसा हम यूपी में होते देख रहे हैं।
पहले के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से लेकर लालू , राबड़ी, नीतीश, बीच के जीतन राम मांझी तक, किसी मुख्यमंत्री ने अपने सार्वजनिक भाषणों में कभी भी सांप्रदायिकता उभारने वाले शब्दों और वाक्यों का प्रयोग नहीं किया जैसा यूपी में योगी और एमपी में मोहन यादव करते रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्रियों ने, चाहे उनके राज में कम या ज्यादा प्रशासनिक ढीलापन रहा हो, बाहुबलियों और माफियाओं का प्रताप रहा हो, कम या ज्यादा भ्रष्टाचार रहा हो, अपने राज काज के संचालन में सांप्रदायिक चश्मे का प्रयोग नहीं किया।
इसका एक सीधा सा कारण यह है कि अभी तक बिहार में जितने भी मुख्यमंत्री रहे हैं उनकी राजनीति की यूएसपी सांप्रदायिकता नहीं रही। लालू और नीतीश अपनी अपनी राजनीति में अपने अपने जातीय समीकरण साधते रहे, इस क्रम में उन्होंने प्रशासन और संस्थानों के संचालन में जातीय आग्रहों को जगह दी होगी, लेकिन उन्होंने उस दौर में भी अपने राज्य को सांप्रदायिकता के जहरीले माहौल से बचा कर रखा जब देश की राजनीति में सांप्रदायिकता का रंग उत्तरोत्तर चढ़ता गया। स्वस्थ लोकतंत्र और सभ्य समाज में जातीय आग्रह कोई सकारात्मक चीज नहीं है लेकिन हमें मानना होगा कि इसकी जड़ें हजारों वर्षों से चली आ रही हमारी सामाजिक विडंबनाओं में निहित हैं। यह कोई ओढ़ी गई मानसिकता नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की बुनावट में निहित है। आधुनिक ज्ञान और वैचारिकी की रोशनी में इसके अंतर्विरोधों से लडऩे के लिए न जाने कितने सुधारक, विद्वान और विचारक हमारे बीच हुए हैं। उन्होंने बदलाव लाए भी हैं, समाज को आगे बढ़ाया भी है। जातीय आग्रह हैं, इनकी तमाम नकारात्मकताएं हैं लेकिन इनसे लड़ाई भी निरंतर जारी है। इसके लिए कानून बने हैं, प्रावधान तय किए गए हैं।
लेकिन, सांप्रदायिकता ऐसी चीज है जिसे राजनीति में ओढ़ा गया है, भड़काया गया है। यह कितनी जहरीली हो सकती है, व्यक्ति को और समूहों को कितना अमानवीय बना सकती है इसके उदाहरण गिनना संभव नहीं। हम मध्यकाल में नहीं जी रहे इसलिए हम मध्यकालीन माइंडसेट के साथ आज के दौर की सामाजिक राजनीतिक चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। यह इतिहास के अध्येताओं का क्षेत्र है कि मध्यकाल में सांप्रदायिकता का क्या स्वरूप था और उसके कौन से आधार थे, राजनीति में उसके कैसे दुरुपयोग थे। वर्तमान दौर में तो सांप्रदायिकता राजनीति का औजार है और आधुनिक राजनीति की सबसे गलीज, सबसे कुत्सित प्रवृत्ति है। यह समाज में सिर्फ जहर फैला सकती है, राजनीति को पतित बना सकती है, समाज और राजनीति को कुछ सकारात्मक दे नहीं सकती। इसलिए, कोई कहता है कि अगर राजनीति में जातिवाद है तो धर्मवाद क्या बुरा है…तो यह दो नितांत भिन्न सामाजिक अंतर्विरोधों को एक कसौटी पर कसने का शातिराना प्रयास है।
भले ही जीतन मांझी अपनी बहू, अपने बेटे भतीजे को टिकट दे कर मंत्री विधायक बनवा रहे हैं, लेकिन उन्होंने मुसहरवाद की राजनीति कर एक उपेक्षित जातीय समुदाय को राजनीति की धारा में कोई स्वर तो दिया ही है। यही बात ऐसे अन्य नेताओं के बारे में भी कही जा सकती है। लालू ने शुरू में पिछड़ावाद किया, फिर यादववाद पर रह गए, पर उनकी राजनीति में सकारात्मकताओं के कई आयाम हैं। यह सदियों की जड़ता से लडऩे का एक अनगढ़ ही सही, लेकिन एक जाग्रत अभियान था। लेकिन, हम आडवाणी से लेकर मोदी और योगी की हिंदूवादी राजनीति में सकारात्मकता के कौन से सूत्र तलाशें? दक्षिणपंथी राजनीति को अपना कंधा बना कर कॉरपोरेट ने भले ही उन्हें सत्ता तक पहुंचा देने में और वहां बनाए रखने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई हो, लेकिन इन लोगों ने समाज को और राजनीति को ऊंचा उठाया है या नीचे गिराया है, यह इतिहास जरूर तय करेगा।
जब अपने चुनावी भाषणों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गजवा ए हिंद जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए भीड़ में काल्पनिक भय का संचार करने का प्रयास करते हैं तो वे आधुनिक राजनीति की कुरूपता का एक कुत्सित अध्याय रचते ही दिखते हैं। बुलडोजर न्याय और एनकाउंटर की न्यायेतर परंपरा कानून का राज कायम नहीं करती बल्कि ऐसे लोगों को मनमानियों की छूट देती है जिनके विवेक संदिग्ध हैं। बिहार ने अभी तक ऐसा कोई मुख्यमंत्री नहीं देखा। अगर इसी विधान सभा में भाजपा को अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला, जिसकी संभावना से इन्कार तो नहीं ही कर सकते, तो हम बिहार के किसी मुख्यमंत्री के भाषण में भी योगी और मोहन यादव जैसों की शब्दावली का प्रयोग देख सुन सकते हैं। एनकाउंटर, बुलडोजर आदि की गूंज तो आने ही लगी है। यह संविधानेतर अराजकताओं की आहट भी है। बिहार में भाजपा के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो अपने दम पर राजनीतिक आभा बिखेर सके।अपने को मजबूत करने और दिखाने के लिए वह अतिरिक्त उपक्रम करेगा और इस क्रम में सांप्रदायिक शब्दों को औजार बनाने की उसकी विवशता हो सकती है। हो ही सकती है क्योंकि बिहार में भाजपा का कोई ऐसा नेता नहीं जो किसी एक जिला में भी अपना मजबूत जनाधार रखता हो, पूरे बिहार की तो बात ही दूर है। उसे प्रेरणा और शक्ति दिल्ली में बैठे शाह जी से ही मिलेगी।
नीतीश राज खत्म और अमित शाह के हाथों में बिहार की कमान? सोच कर ही झुरझुरी सी फैल जाती है देह और मन में। अगर समीकरण बनें, बिगड़ें और फिर से चुनाव हो जिसमें नीतीश भाजपा के साथ न हों, तो फिर भाजपा के लिए बिहार की सत्ता दु:स्वप्न बन कर रह जाएगी। यह जो दो सौ पार है इस जीत के केंद्र में भाजपा नहीं, नीतीश रहे हैं। लेकिन फिर से चुनाव…यह दूर की कौड़ी है। भाजपा जैसी सर्वशक्तिमान पार्टी, संस्थाएं जिसकी देहरी पर मत्था टेकने की मुद्रा में खड़ी हैं, ऐसी नौबत कैसे आने देगी? अपने इतिहास के बेहद नाजुक मोड़ पर है बिहार। यह गरीब सही, लेकिन यहां के समाज में, यहां की राजनीति में कुछ है ऐसा जिसे बिहारीपन कहते हैं। यह इस जहरीले दौर में भी बिहार को एक अलग आभा देती है। नीतीश के बाद इस आभा पर खतरे मंडरा रहे हैं। बिहार का बिहारीपन दांव पर है।