फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) उद्घाटनजीवी प्रधानमंत्री मोदी का ढिंढोरा पीटने के लिए देश भर में बनाए जा रहे घटिया राष्ट्रीय राजमार्गों में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे भी शामिल होने वाला है। चालू होने से चंद माह पहले ही इसकी सर्विस रोड में आठ फुट चौड़ा और तीन फीट गहरा गड्ढा हो गया था लेकिन अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, मज़दूर मोर्चा ने इसकी विस्तृत खबर प्रकाशित की थी।
अब पता चला है कि एनएचएआई का यह हिस्सा तो शुरू कर दिया गया है लेकिन जल निकासी की व्यवस्था चालू नहीं की गई, यानी थोड़ी सी बारिश में भी राष्ट्रीय राजमार्ग पर जलभराव होगा जो तारकोल का दुश्मन माना जाता है, यानी पहली बरसात में ही एक्सप्रेस वे की मजबूती की सच्चाई सामने आने की आशंका है। इतनी बड़ी खामी सामने आने के बाद अब एक्सप्रेस का ठेकेदार इसे दुरुस्त करने के लिए एफएमडीए के चक्कर लगा रहा है, लेकिन बताया जा रहा है कि ड्रेनेज चलाया जाना आसान नहीं है क्योंकि इसमें कई रोड़े हैं।
दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे का सेक्टर 37 से सेक्टर 65 तक करीब 24 किलोमीटर का हिस्सा औद्योगिक नगरी से गुजर रहा है। एक्सप्रेस वे की ड्राइंग में दोनों किनारों पर ड्रेनेज यानी नाले की व्यवस्था भी की गई है। उद्घाटन की जल्दबाजी में एनएचएआई ने सड़क निर्माण पर तो पूरा जोर लगा दिया लेकिन नाला निर्माण में ढील बरती गई। चर्चा है कि 24 किलोमीटर में कई जगहों पर ड्रेनेज यानी नाला बना ही नहीं है। जहां बना दिया गया है वहां अतिक्रमण और कब्जे भी हो गए हैं।
आधी अधूरी ड्रेन की सबसे बड़ी खामी ये है कि इससे जल का निकास किस जलाशय या डिस्पोजल में किया जाएगा इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गई है, यानी नालों को कहीं जोड़ा नहीं गया है। अब अधिकारियों को डर सता रहा है कि यदि बारिश हुई तो एक्सप्रेस वे पर जलभराव की समस्या होगी जिसके कारण जाम और हादसे भी हो सकते हैं। बावजूद इसके एनएचएआई के अधिकारियों ने मामला सुलटाने का जिम्मा ठेकेदार सौरभ सिंगला पर डाल दिया है। बीते सोमवार ठेकेदार ने एफएमडीए के चीफ इंजीनियर विशाल बंसल के साथ बैठक की।
बैठक में उन्होंने ड्रेनेज की समस्या का समाधान किए जाने के लिए एफएमडीए से मदद मांगी। यह काम एनएचएआई के अधिकारियों को करना चाहिए था। विशाल बंसल के अनुसार उन्होंने एनएचएआई से एक्सप्रेस वे की ड्राइंग मांगी है ताकि निर्धारित किया जा सके कि कहां कहां डिस्पोजल की कनेक्टिविटी दी जा सकती है। बैठक में यह भी सामने आया कि कई जगहों पर नाला बनाया ही नहीं गया है, ऐसे में वहां की जल निकासी व्यवस्था निर्धारित नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि एफएमडीए ने एनएचएआई के साथ मिलकर 24 किलोमीटर के सेक्शन का मुआयना करने का प्रस्ताव रखा है ताकि निर्धारित किया जा सके कि कहां-कहां कनेक्टिविटी दी जा सकती है।
सवाल ये है कि जब सड़क के साथ-साथ नाला भी बनना था तो फिर कई जगहों पर इसे छोड़ क्यों दिया गया, यदि कोई समस्या थी तो उसे तब ही समाधान क्यों नहीं किया गया, ताकि भविष्य में कोई समस्या उत्पन्न न हो। यह भी जरूरी है कि निरीक्षण करने से पहले पूरे 24 किलोमीटर में अधूरे नालों का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसकी प्रक्रिया ठेकेदार ने शुरू नहीं की है। ऐसे में यदि एफएमडीए कनेक्टिविटी दे भी देगा तो भी कई जगहों पर जलभराव से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जानकारों के अनुसार यह एनएचएआई की लापरवाही है, डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट में ही सब पहले ही निर्धारित किया जाता है कि ड्रेन की गहराई कितनी होगी, बहाव के लिए उसकी ढाल किस तरफ बनाई जाएगी, जल निकासी किस जलाशय या डिस्पोजल में की जाएगी। उस जलाशय या डिस्पोजल की कनेक्टिविटी के लिए निर्धारित स्थान कहां कहां और कितने होंगे। जलाशय या डिस्पोजल से कनेक्टिविटी के लिए स्थानीय नगर निगम या प्राधिकरण से समन्वय किया जाता है, निर्माण के साथ ही निगम या प्राधिकरण कनेक्टिविटी भी दे देती है लेकिन एक्सप्रेस वे के निर्माण में एनएचएआई ने इसकी जरूरत ही नहीं समझी, न ही निगम या प्राधिकरण ने एक्सप्रेस वे बनने के कारण उनके ड्रेनेज या अन्य सेवाओं में होने वाले बदलाव के लिए एनएचएआई से संपर्क किया, नतीजा सामने है। हालांकि, अगला मॉनसून सीजन शुरू होने से पहले ही ये खामियां दुरुस्त करने किए जाने का दावा किया जा रहा है लेकिन ठेकेदार की सुस्त चाल और एफएमडीए की कार्यशैली से ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। आम जनता तो आधे अधूरे एक्सप्रेस वे का इस्तेमाल करने के लिए टोल पर मोटी रकम चुकाने को मजबूर है ही।