फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रदूषण को लेकर जो प्रशासन रात दिन किसानो की पराली पर हो हल्ला मचा रहा था, उसे अब शहरों में गली गली में जलते कचरे के ढेर, सड़कों पर धूल के उठते गुबार, रात दिन धड़ाधड़ बजते पटाखों से निकलने वाले गंधकीय धुऐं से कोई तकलीफ नहीं है। विदित है कि धान की फसल कटने के बाद किसानों ने पलेवा करके गेहूं की बिजाई शुरू कर दी है यानी अब पराली का बहाना तो रहा नहीं, बाकी धुआं इनको दिखता नहीं।
शहर की वायु गुणवत्ता खराब या चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है। सड़कों पर पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) 10 के कण धूल धक्कड़ के रूप में उड़ रहे हैं। वायु गुणवत्ता खराब होने पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान दो लागू कर दिया है। इस स्तर पर सड़कों पर उडऩे वाली धूल को थामने के लिए मशीन से झाड़ू लगाना, एंटी स्मॉग गन का इस्तेमाल करने के साथ खुले में कूड़ा जलाना पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। बावजूद इसके अभी तक ट्रक माउंटेड झाड़ू मशीन का इस्तेमाल सड़कों पर होता नहीं दिख रहा, बहुत संभव है कि नगर निगम के भ्रष्ट अधिकारी इसे कागजों पर चला कर अपनी जेबें भरने का बंदोबस्त कर रहे हों। नए नए विधायक बने धनेश अदलखा, विपुल गोयल, सतीश फागना जैसे जनप्रतिनिधि भी कोढ़ में खाज साबित हो रहे हैं। पूरे शहर में सफाई के इनके फरमान के कारण सुबह सुबह सफाई कर्मियों की फौज झाड़ू लेकर सड़कों पर उतरी नजर आती है। ग्रेप एक में ही मैनुअल ढंग से सफाई मना है बावजूद इसके निगम यह काम करा रहा है। ग्रेप का उल्लंघन करने के लिए एनजीटी को निगम के खिलाफ कार्रवाई करना चाहिए।
वायु प्रदूषण के लिए किसानों पर पराली जलाने का ठीकरा फोडऩे वाले अधिकारी रोजाना खुलेआम जलाए जा रहे कूड़े पर रोकथाम नहीं कर पा रहे हैं। कार्रवाई के नाम पर होटल-ढाबों में जलने वाले तंदूर बंद करवाए जा रहे हैं, उनसे एक हजार से पांच हजार तक का जुर्माना वसूला जा रहा है। इन अधिकारियों को जलते हुए तंदूर तो नजर आ जाते हैं लेकिन सेक्टर 58 इंडस्ट्रियल एरिया, बाईपास रोड, कृष्णा कॉलोनी रेलवे लाइन के पास, बाटा पुल के पास जैसी अनगिनत जगहों पर रोजाना जलाए जाने वाले कूड़े के ढेर और उनसे उठने वाला काला धुआं नजर नहीं आता। शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक 300-400 के बीच पहुंच चुका है, धूल रोकने के लिए निगम के भ्रष्ट अधिकारियों ने पानी छिड़काव के नाम पर एंटी स्मॉग गन चलाने के नाम पर मोटे मोटे बिल बनाने शुरू कर दिए हैं।
प्रदूषण की रोकथाम के नाम पर डीजल-पेट्रोल वाहनों की जांच और मोटे चालान काटने का खेल भी शुरू हो जाएगा लेकिन आबोहवा सुधारने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए जाएंगे। ग्रेप लागू होते ही इमरजेंसी मामलों को छोड़ कर बिजली की कटौती नहीं की जाती, इसके विपरीत पूरे शहर में सुबह, दोपहर शाम कहीं न कहीं बिजली कटौती हो रही है। शहर की गली कूचों में चल रहे कल-कारखाने बिजली जाने पर धड़ल्ले से जेनरेटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। खराब वायु गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण के मद्देनजऱ एनजीटी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पटाखों पर प्रतिबंध लगा चुकी है। शहर में सल्फर युक्त धुआं छोडऩे वाले और कानफोड़ू आवाज के साथ ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे दशहरे के बाद से लगातार जलाए जा रहे हैं, दिवाली पर तो इतने पटाखे चला गए कि हर तरफ हवा में बारूद की महक महसूस होती रही, आसमान में स्मॉग छा जाता है लेकिन ये प्रदूषण अधिकारियों को कतई नजर नहीं आते।
जिन गावों में पराली जलाए जाने की हाय तौबा मचाई जाती रही है उनमें शहरों के मुकाबले वायु की गुणवत्ता कहीं बेहतर है, जो कुछ गड़बड़ है वह भी शहरों के कारण ही है। अब तो पराली भी नहीं जलाई जा रही है, अब तो अधिकारी वायु गुणवत्ता में सुधार कर लें। वायु प्रदूषण तो ये क्या रोकेंगे इनसे ध्वनि प्रदूषण भी नहीं रुक रहा, जिसे रोकने के लिए कुछ करना ही नहीं होता, सिवा डंडा घुमाने के यानी सख्ती करने के।