( 1 )
ता उम्र मुश्किलात में कुछ इस तरह जिया जैसे कि आंधियों में भी जलता रहा दिया
अर्ज़े हयात के लिए क्या क्या नहीं किया क़त्ले ज़मीर तो मगर मैंने नहीं किया
ग़ैरों का जुर्मो ज़ुल्म भी अपने सर लिया होवे सवाब या गुनाह जो करना था किया
जो भी ख़ुदा ने बा रहम ख़ुश होके दे दिया उसके सिवा किसी से कभी कुछ नहीं लिया
सब के हैं अपने अपने घर कोई न दर ब दर इक मैं हूं जिसका अब तलक कोई न आशियां
दिन कट गया पर शाम को लगता नहीं जिया तू भी ए दिल अपने लिए कोई बना ठिया
1. अर्ज़े हयात = सांसारिकसुख 2. क़त्ले ज़मीर = अन्तरात्मा वध 3. सवाब = पुण्य, 4. बा रहम = दयापूर्वक, 5. ठिया = ठिकाना
( 2 )
सच को न चाहिए बैसाखी झूठे ही करते हैं वकील
जिस की न पुख़्ता हो दलील वह जिय़ादा करता क़ाल ओ क़ील
सच है महफ़ूज़ सरे मैदां झूठ की मजबूरी है फ़सील
मज़हब के धोखे में मत आ हुक्मे ज़मीर की कर तामील
जो जीते हैं माज़ी में उन्हें माज़ी ही जाया करता लील
बेमौक़े बेहूदा बातों का मतलब है होना ज़लील
1. क़ाल ओ क़ील = वाद-विवाद, 2. फ़सील = चारदिवारी