कविता

कविता
August 26 18:07 2024

देश जा रहा है सेठों की जेब मे

देश जा रहा है सेठों की जेब में
समाधान ढूंढते हो औरंगजेब में

बेटियां लाचार बनाते हो घर में
सुरक्षा चूक खोजते हो बाहर में

जब गीता में कर्म का संदेश है
फिर भी रोजगारविहीन देश है

अखंड भारत की बात करते हो
बांट कर राज करो पर चलते हो

किसी दिन ये सवाल खड़े होंगे
हर जवाब पर बवाल खड़े होंगे

काफिर हूं सरफिरा हूं
मुझे मार दीजिए
काफिर हूं सरफिरा हूं मुझे मार दीजिए
मैं सोचने लगा हूंं मुझे मार दीजिए

है एहतिराम-ए-हजऱत-ए-इंसान मेरा दीन
बे-दीन हो गया हूंं मुझे मार दीजिए

मैं पूछने लगा हूं सबब अपने क़त्ल का
मैं हद से बढ़ गया हूं मुझे मार दीजिए

करता हूं अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से सवाल
गुस्ताख़ हो गया हूं मुझे मार दीजिए

ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम
कितना भटक गया हूं मुझे मार दीजिए

मालूम है मुझे कि बड़ा जुर्म है ये काम
मैं ख़्वाब देखता हूं मुझे मार दीजिए

ज़ाहिद ये ज़ोहद-ओ-तक़वा-ओ-परहेज़ की रविश
मैं ख़ूब जानता हूं मुझे मार दीजिए

बे-दीन हूं मगर हैं ज़माने में जितने दीन
मैं सब को मानता हूं मुझे मार दीजिए

फिर उस के बाद शहर में नाचेगा हू का शोर
मैं आ$िखरी सदा हूं मुझे मार दीजिए

मैं ठीक सोचता हूं कोई हद मेरे लिए
मैं साफ़ देखता हूं मुझे मार दीजिए

ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूं साफ़ ज़ुल्म
क्या ज़ुल्म कर रहा हूं मुझे मार दीजिए

जिंदा रहा तो करता रहूंगा हमेशा प्यार
मैं साफ़ कह रहा हूं मुझे मार दीजिए

जो ज़ख़्म बांटते हैं उन्हें ज़ीस्त पे है हक़
मैं फूल बांटता हूं मुझे मार दीजिए

बारूद का नहीं मिरा मस्लक दरूद है
मैं ख़ैर मांगता हूं मुझे मार दीजिए
कठिन शब्दों के मायने

-अहमद फऱहाद

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Mazdoor Morcha
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