बेलगाम शिक्षा माफिय़ा कू्ररता की हदें लांघ रहा है

बेलगाम शिक्षा माफिय़ा कू्ररता की हदें लांघ रहा है
August 20 05:04 2024

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
स्कूल में सभी बच्चों के सामने अपमानित होने का ज़ख्म मासूम बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर बहुत गहरा गुद जाता है ! यह ज़ख्म कभी नहीं भरता। ख़ासतौर पर प्राइमरी स्कूल के उन अध्यापकों को हम जीवनभर नहीं भूलते जिन्होंने पाठ्यक्रम से बाहर जाकर अध्यापकीय ड्यूटी की सीमा से आगे बढ़ते हुए हमें, संवेदनशीलता से तराशा होता है, कंधे पर हाथ रखकर प्यार और स्नेह से समझाया होता है कि नजऱ आते ही हमारे हाथ खुदबखुद उनके पैरों की ओर बढ़ जाते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे मास्टर जी भी पल्ले पड़ते हैं जिन्होंने हमें बिना किसी ख़ास वज़ह पूरी क्लास के सामने ज़लील किया होता है ! वह ज़ख्म भी कभी नहीं भरता। कितना भी वक़्त गुजर जाए जब भी वो लम्हा याद आता है वैसी ही टीस महसूस होती है, जैसी उस दिन हुई थी।

‘दिल्ली पब्लिक स्कूल, फेज 1, सेक्टर 3 द्वारका, नई दिल्ली-78 में शिक्षा की एक चमचमाती दुकान है। इस स्कूल में 2021 तक नर्सरी से कक्षा 12 तक मासिक ट्यूशन फीस शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित, रु 7,785 ही थी। दिल्ली उच्च न्यायलय ने 2016 में एक बेहतरीन फ़ैसला सुनाया था; ‘निजी स्कूल भी दिल्ली शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित फ़ीस से ज्यादा की उगाही नहीं कर सकते क्योंकि वे भी स्कूल का निर्माण करने के लिए बेशकीमती सरकारी ज़मीन बहुत सस्ते में हासिल करते हैं।

इस स्कूल ने दिल्ली उच्च न्यायलय तथा शिक्षा विभाग के आदेशों को ठुकराते हुए इस साल अप्रैल में सभी बच्चों की मासिक ट्यूशन फ़ीस 7785 रुपये से बढ़ाकर 14700 रुपये कर दी। अलग-अलग नामों से जो उगाही साल भर चलती है उसे भी बढ़ा दिया। यह बढ़ी फ़ीस इसी साल 2024-25 से लागू है, या दो साल पहले 2022-23 से यह भ्रम भी बना रहने दिया। स्कूल की घोषणा से बच्चों के घर हड़कंप मच गया। अप्रैल महीने में ही स्कूल ने आगामी वर्ष 2024-25 के लिए बढ़ी फ़ीस की उगाही जिस अंदाज़ में शुरू की, उससे पता चलता है कि शिक्षा के बहाने मध्यवर्ग को बेरहमी से निचोड़कर मुनाफ़ा कूटने वाला शिक्षा माफिय़ा कितना क्रूर और संवेदनहीन है ! देश के किसी क़ायदे-क़ानून को दो कौड़ी की क़ीमत नहीं देता।

स्कूल के 21 छात्रों के मां-बाप, बढ़ी फ़ीस नहीं भर पाए। इन छात्रों को स्कूल ने पहले उनकी क्लास में सभी बच्चों के सामने अपमानित किया, प्रताडि़त किया, धमकियां दीं। उसके बाद भी जब वे बच्चे बढ़ी हुई फ़ीस भरने में नाकाम रहे तो मई महीने में रजिस्टर से नाम काटकर उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया। इन 21 बच्चों में कई ऐसे भी हैं जिनके दूसरे भाई- बहन भी उसी स्कूल में पढ़ते हैं और जो इस उम्मीद में थे कि दो बच्चों में से एक को तो कम से कम फ़ीस में कुछ रियायत मिलेगी ही। रहम की ऐसी सभी उम्मीदें शिक्षा माफिय़ा की मुनाफ़े की भूख की आग में स्वाह हो गईं।

शिक्षा माफिय़ा की कू्ररता की इन्तेहा
स्कूल की बर्बरता की इन्तेहा तो तब हुई जब बढ़ी फ़ीस न दे पाने वाले बच्चों को क्लास में सब बच्चों के सामने प्रताडि़त किया जाता रहा और उन्हें स्कूल से निकाल देने की धमकियां दी जाती रहीं। यहां तक कि उन्हें बाथरूम जाने से भी रोक कर प्रताडि़त किया गया। बाथरूम इस्तेमाल से रोके जाने वाले बच्चों में वह बच्ची भी शामिल थी जो नैसर्गिक मासिक पीरियड के दिनों से गुजर रही थी। उसने अपनी अध्यापिका से यह बात बताई भी लेकिन उसके बाद भी उसे बाथरूम नहीं जाने दिया गया।

इतना ही नहीं स्कूल मालिकों ने इन मासूम बच्चों से खुन्नस निकालते हुए न सिफऱ् उनके नाम काटकर स्कूल से बाहर कर दिया, बल्कि उनके नाम अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक भी कर दिए मानो वे अपराधी हों ! 18 साल से कम उम्र के बच्चों द्वारा कोई जघन्य अपराध भी अगर हो गया हो तब भी उनके नाम सार्वजनिक करना संविधान की धारा 21 का उल्लंघन है, जघन्य अपराध है। अब मामला आपराधिक हो गया जिसकी शिकायत 15 मई को ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स में की गई। कमीशन ने पुलिस उपायुक्त द्वारका को लिखा कि 21 बच्चों के नाम प्रकाशित करने के लिए स्कूल प्रबंधन (प्रिंसिपल प्रिया नारायणन तथा चेयरमैन बी के चतुर्वेदी) के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

स्कूल द्वारा प्रताडि़त इन 21 बच्चों के मां-बाप एक ही शत्रु से लडऩे की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से संगठित हो गए। उन्होंने जुलाई के शुरू में दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग के सामने प्रदर्शन किया जिसे मीडिया ने अच्छी तरह कवर किया। शिक्षा विभाग को पूरा मामला सुनना पड़ा। बढ़ाई गई फ़ीस को अनुचित एवं अन्यायपूर्ण मानते हुए दिल्ली राज्य शिक्षा अधिकारी ने स्कूल प्रबंधन को आदेश दिया कि पहली फ़ीस का भुगतान करने वाले बच्चों को तुरंत वापस लिया जाए। शिक्षा विभाग ने 19 जुलाई को स्कूल प्रबंधन को ‘कारण बताओ नोटिसÓ जारी कर पूछा कि अचानक हुई इस फ़ीस वृद्धि के कारण बताए। यह अनुचित और अन्यायपूर्ण है फ़ीस वृद्धि तत्काल वापस ली जाए।
शिक्षा विभाग ने स्कूल को यह भी याद दिलाया कि आपके स्कूल को डीडीए द्वारा बहुत ही रियायती दर पर प्लाट का आवंटन हुआ था जिसकी शर्तें थीं कि स्कूल गरीब बच्चों को पढ़ाएगा। उस वक़्त आपने सभी शर्तों को मंज़ूर करते हुए हस्ताक्षर किए थे। शिक्षा विभाग के आदेश को स्कूल प्रबंधन ने दो कौड़ी की क़ीमत नहीं दी और बच्चों से कहा दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग को कोई अधिकार नहीं कि हमारे मामले में दख़ल दे। वह विभाग तो सरकारी स्कूलों को देखता है, इस स्कूल में पढऩा है तो घर से पूरे पैसे लेकर आना।

स्कूल प्रबंधन के इस अन्याय के खिलाफ अभिभावकों ने दिल्ली उच्च न्यायलय का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत ने 9 जुलाई को आदेश दिया कि आगामी वर्ष 2024-25 के लिए बढ़ी फ़ीस का 50 प्रतिशत भरने वाले बच्चों को निष्कासित न किया जाए। शिक्षा माफिय़ा की हिमाक़त देखिए; स्कूल ने 50 प्रतिशत बढ़ी फ़ीस का भुगतान करने वाले बच्चों को उनकी कक्षाओं में बिठा तो लिया लेकिन उच्च अदालत के आदेश को अपनी जागीरदारी में अनावश्यक दख़ल मानते हुए मामला अदालत के विचाराधीन होते हुए भी एक अभिभावक को ई-मेल भेजकर धमकी दी कि अगर बढ़ी हुई फ़ीस, 15 जुलाई तक जमा नहीं की तो आपके छोटे बच्चे को स्कूल से निष्कासित कर दिया जाएगा। अदालत का आदेश तो बड़े बच्चे के लिए है।

अदालती न्याय की भी विडम्बना देखिए। दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूल द्वारा बेतहाशा बढाई गई फ़ीस को अन्यायपूर्ण और अनुचित मानकर वापस लेने को कहा था। उस सबसे अहम मुद्दे पर अदालत ने कुछ नहीं बोला। अगर अदालत भी बढ़ी फ़ीस को अन्यायपूर्ण बता देती तो न सिफऱ् उन बच्चों को दमनकारी घुटन, मनोवैज्ञानिक आघात और प्रताडऩा से मुक्ति मिलती बल्कि दूसरे बच्चों जिनके मां-बाप ने जैसे-तैसे कज़ऱ् लेकर अपना पेट काटकर स्कूल की फ़ीस इस डर से जमा की कि मेरे बच्चे को पूरी क्लास के सामने ज़लील किया जाएगा उन्हें भी राहत मिलती। साथ ही इस अदालती आदेश के बल पर बाक़ी शिक्षा की दुकानों में मच रही लूट से भी कुछ राहत मिलती। वर्ष 2024-25, चूंकि अगले साल अप्रैल तक चलेगा इसलिए अदालत ने इंसाफ की एक छोटी सी किस्त ही ज़ारी की; आधी रक़म का भुगतान करने वाले बच्चों को स्कूल से मत निकालो। मानो स्कूल से रहम मांगा जा रहा हो !

निजी स्कूल दरअसल स्कूल नहीं हैं शिक्षा माफिय़ा की उगाही के अड्डे हैं। मध्यप्रदेश में शिक्षा की ऐसी ही चमचमाती निर्मम और क्रूर दुकानों की बेरहम उगाही के विरुद्ध, प्रताडि़त मां-बाप जबलपुर उच्च न्यायलय में गए और अदालत ने मध्यप्रदेश के 10 निजी स्कूलों को 69 करोड़ रु की नाजायज़ वसूली गई फ़ीस को लौटाने का आदेश सुनाया है।

दिल्ली के कुछ ऐसे ही उगाही अड्डों की सालाना फ़ीस इस तरह है; पाथ वेज़ स्कूल, रुपये 5,88,000; अमेरिकन एम्बेसी स्कूल, 20,00,000; ब्रिटिश स्कूल, 1,76,500; जी डी गोयनका स्कूल, 8,00,000; मॉडर्न स्कूल 5,00,000।  की हदें लांघ रहा है

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles