डॉ. रामवीर
धर्म धर्म नहीं रहता जब वह हो जाता है रोजगार धर्म से जिनकी चले जीविका वे क्या करेंगे पर-उपकार।
अर्थ और काम में जिनकी नहीं हुआ करती आसक्ति धर्मज्ञान उन्हें ही होता धर्मग्रन्थ की ही यह उक्ति।
महाकुम्भ में जो कुछ देखा उसे देख कर हुई निराशा आस्थावान् बुद्धिहीनों से आदर्शों की कैसी आशा।
अपने किए पापों का भय व स्वर्ग प्राप्त करने का लालच इतनी भीड के पीछे ये दो प्रेरक कारण ही लगते सच।
मुसलमान मिर्जा गालिब ने कहा था जो जन्नत के बारे कुम्भस्नान से स्वर्गप्राप्ति के बारे हिन्दू भी विचारें।
आस्था होती ऐसी अवस्था जिसमें सोच हो जाता स्थगित जैसा सुना वैसा ही मानने तक बुद्धि हो जाती सीमित।
‘धर्म के नाम पर’ नामक पुस्तक रचना आचार्य चतुरसेन की आज जरूरत इस पुस्तक के परिवर्धित नव संस्करण की।
सन्तों एवं सुधारकों ने जिन कुरीतियों को था सुधारा राज्याश्रय से अब दुगुनी हो वे ही लौट रहीं दोबारा।