फरीदाबाद। सत्ता संभालते ही सीएम सैनी ने नगर निगम में प्रतिदिन समाधान शिविर के आयोजन की घोषणा कर यह साबित कर दिया था कि भाजपा की पिछले दस साल की सरकारों में आम जनता का कोई काम नहीं हुआ और उसको दफ्तरों में भटकना पड़ा। दस साल में इतने बड़े पैमाने पर पैदा की गईं समस्याओं के समाधान के लिए सीएम के आदेश पर जोर-शोर से शुरू किए गए समाधान शिविरों में भी अब टाल मटोल होने लगी है, और जनता को एक से दो सप्ताह का समय देकर लौटाया जाने लगा है।
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार समाधान शिविर में सबसे ज्यादा शिकायतें प्रॉपर्टी आईडी सुधरवाने की आ रही हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं हो पा रहा। होगा भी कैसे, जिस प्रॉपर्टी आईडी का कोई डेटा खुद नगर निगम के पास उपलब्ध नहीं है। डेटा में 1 लाख 29 हज़ार प्रॉपर्टी पूरी तरह गायब हों और नगर निगम के निकम्मे अधिकारी-कर्मचारी बीते चार साल में उसे ठीक न कर सके हों उसे हाथों-हाथ कैसे सही किया जा सकता है।
दरअसल पूर्व सीएम खट्टर प्रॉपर्टी आईडी योजना ही जनता की गाढ़ी कमाई अपने संघी दोस्त जयपुर के संजय गुप्ता की याशी कंसल्टेंसी पर लुटाने और भ्रष्टाचार को बढ़ाने के लिए लाए थे। सुधी पाठकों को मालूम होगा कि आज से बीस- तीस साल पहले निगम कर्मचारी घर-घर जाकर सर्वेक्षण करते थे और घरों दुकानों, कारखानों आदि की रिपोर्ट तैयार किया करते थे। तब भी ये कर्मचारी हरामखोरी और बेईमानियां करते थे, जैसे तीन मंजिला मकान को दो मंजिला बताना, पांच सौ गज की जगह चार सौ गज दर्शाना, आदि यानी उस वक्त भी लूट कमाई चलती थी, हालांकि ये बेईमानियां पकड़ में भी आ जाती थी और संबंधित कर्मचारियों को सजा देने के साथ रिपोर्ट भी सही कर ली जाती थी। प्रॉपर्टी के सर्वेक्षण का यही काम कर्मचारियों से अब भी कराया जा सकता था लेकिन खट्टर तो नौकरियां खत्म करने में लगे रहे, जो कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए उनकी जगह नई भर्ती नहीं की गई। इसकी जगह खट्टर ने संजय गुप्ता की याशी कंसल्टेंसी को काम सौंप दिया।
याशी कंसल्टेंसी ने नौसिखुए लगाकर चार-छह महीने में ही पूरे शहर की 5 लाख 17 हजार प्रॉपर्टी आईडी बना कर नगर निगम को सौंप दीं। निगम अधिकारियों को इस डेटा का सत्यापन करने के बाद ही कंपनी को भुगतान किए जाने की स्वीकृति देनी थी लेकिन खट्टर के दबाव में कंपनी को कार्य पूर्ण होने का प्रमाणपत्र दे दिया गया। सरकार ने जन्म प्रमाण पत्र, रजिस्ट्री, आधार से लेकर सभी सरकार काम में प्रॉपर्टी आईडी अनिवार्य कर दी। याशी कंपनी द्वारा दिया गया प्रॉपर्टी आईडी का लगभग 95 आंकड़ा फर्जी निकला और लोगों की मुसीबतें बढ़ गईं। निगम के भ्रष्ट कर्मचारियों ने जरूरतमंदों की प्रॉपर्टी आईडी सही करने के नाम पर पांच से दस हज़ार रुपये तक वसूले, कई मामलों में लाखों तक वसूले गए। पूरे प्रदेश में गलत प्रॉपर्टी आईडी का मामला तूल पकडऩे लगा। इस पर नगर निगम ने दिसंबर में 2021 प्रॉपर्टी आईडी दुरुस्त कराने के लिए ऑनलाइन आवेदन लेने शुरू कर दिए, लेकिन रिश्वतखोरी के आदी कर्मचारियों ने इस व्यवस्था को चलने ही नहीं दिया।
सूत्रों के अनुसार नगर निगम ने करीब सवा लाख पुरानी आईडी का ब्योरा नए में तब्दील ही नहीं किया है इस कारण इसका रिकॉर्ड ही गायब है। बीते करीब साढ़े तीन साल से इन्हें तलाश नहीं किया जा सका है। इनके अलावा नब्बे प्रतिशत से अधिक प्रॉपर्टी आईडी गलत बनाई गई हैं उनमें कोई सुधार नहीं किया जा रहा है। निगम सूत्र कहते हैं कि सरकार ने याशी कंसल्टेंसी को 58 करोड़ रुपये के साथ क्लीनचिट् भी दे दी अब उसकी गलतियों को दुरुस्त करने के लिए करीब पांच करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार यह बजट जारी नहीं करेगी, ऐसे में आवेदन करने वालों की ही प्रॉपर्टी आईडी दुरुस्त की जाती है लेकिन गलत और गायब डेटा से उसकी तलाश करना आसान नहीं होता। मानव और तकनीकी संसाधनों के बिना पांच लाख प्रॉपर्टी आईडी दुरुस्त करने में दसियों साल लगेंगे। जब डेटा ही सही नहीं है तो फिर समाधान शिविर में तुरंत प्रॉपर्टी आईडी कैसे बन पाएगी, यानी लोगों को शिविर में भी जल्दी समाधान नहीं मिलने वाला।
इस पूरी समस्या का समझने वाला पहलू ये भी है कि सरकार के पास सारी प्रॉपर्टी का डेटा उपलब्ध रहता है। कोई जमीन खरीदी या बेची जाती है तो रजिस्ट्री में उसका रकबा दर्ज होता है, इस जमीन पर भवन बनाने के लिए हूडा या नगर निगम नक्शा पास करता है यानी दुकान-मकान, कारखाना कितने क्षेत्रफल में बनना है कितनी मंजिल हैं यह रिकॉर्ड भी आ गया। भवन बनने पर कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी किया जाता है इसमें भी सारी जानकारियां दर्ज होती हैं।
इन आंकड़ों को इकट्ठा करके प्रॉपर्टी आईडी बनाई जा सकती है। लेकिन असल मामला ये है कि खट्टर सरकार कोई काम करने के बजाय काम करने का नाटक और उसके साथ साथ लूटने के हथकंडे बनाना चाहती थी। इसका दूसरा फायदा सरकार को यह भी रहा कि जनता लाइनों में लगी रहे, दफ़्तरों के चक्कर काटती रहे और उसे सरकार के कारनामों के बारे में सोचने की फुरसत ही न मिले।