गैर-हिंदुओं से नफरत के दौर में फुले का सार्वजनिक सत्य धर्म

गैर-हिंदुओं से नफरत के दौर में फुले का सार्वजनिक सत्य धर्म
April 27 15:45 2026

धीरेश सैनी
हैरानी की बात यह है कि बराबरी का समाज बनाने का ख़्वाब देखने वालों के संघर्षों को जनता के बीच बेअसर करने में जिस तरह सांप्रदायिकता बल्कि मुसलमानों के खिला$फ न$फरत का इस्तेमाल किया गया, उसके बरअक्स फुले के इस्लाम या ईसाई धर्मों के प्रति दृष्टि का जि़क्र कतई नहीं किया जा रहा है। पढ़ें, धीरेश सैनी का यह आलेख(दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें धीरेश सैनी का यह आलेख) जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890) के दूसरे जन्म-शताब्दी वर्ष की दहलीज़ पर कुछ लम्हा ठहर कर यह देखना चाहिए कि उनकी राजनीति क्या थी और यह भी कि उन्हें अपना रहबर बताने वाली बहुजन राजनीति किस तर$फ जा रही है? क्या मंडल-कमंडल के दौर में आए ओबीसी उभार के सितारे तक कमंडल में समाते चले गए और मुसलमानों के प्रति न$फरत के प्रसार ने ओबीसी तबकों को आसानी से ब्राह्मणवाद की पुनर्प्रतिष्ठा के अभियान की वानर-सेना में तब्दील कर दिया? क्या बहुजन या ओबीसी बुद्धिजीवियों ने सत्ता में कुछ हिस्सेदारी तक सीमित होकर सोचा और इस्लामोफोबिया ने कमोबेश उन पर भी असर डाला? और अंतत: यह कि इस्लाम के आगमन को फुले कैसे देखते थे तथा ब्राह्मणवाद से मुक्ति की उनकी राजनीति में मुसलमान अवाम को लेकर उनका क्या रवैया था?

जोतीराव फुले प्रचलित अर्थों में समाज-सुधारक नहीं थे। उनके पास वाहिद नज़रिया था और उस पर अमल की उनकी राजनीति बहुत साफ थी। बेवजह नहीं कि गेल ऑम्वेट उन्हें इंडियन रेनेसां के प्रवर्तक के रूप में देखती हैं। भारतीय इतिहासकार और नवजागरण के शोधकर्ता भले ही फुले के काम को उसके सच्चे अर्थों में देखने-स्वीकारने की स्थिति में कभी नहीं रहे, लेकिन गेल ने ज़ोर देकर कहा- ‘फुले के विचारों ने क्रांतिकारी रास्ते पर सामाजिक बदलाव के नवजागरण की आकांक्षाएं पूरी कीं। समाजशास्त्रीय नज़र से भी यही तर्कसंगत है कि फुले को ही नवजागरण का प्रवर्तक व्यक्तित्व माना जाए, न कि रानाडे से लेकर तिलक तक के बाद के कुलीन चिंतकों को। आखऱि हर संस्कृति किसी-न-किसी वर्ग-आधारित समाज पर ही टिकी होती है और उसमें किसी वर्ग विशेष का प्रभुत्व रहता है। ‘[1]

जोतीराव फुले का बौद्धिक विकास अंग्रेजों के आगमन के साथ पेशवाई जकड़ में आई कुछ ढिलाई के बावजूद सामाजिक व्यवस्था में उसके कड़े प्रभाव और आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा व समतावादी वैश्विक विचारों की रोशनी में हुआ था। प्रतिरोध की कबीर जैसी विरासत और शोषण के शिकार तबकों के लिए इंसा$फ की चाह ने उन्हें एक व्यापक दृष्टिकोण और साहस मुहैया कराया। यूं वे वर्णाश्रम के लिहाज़ से शूद्र ठहरने वाली माली जाति में एक अपेक्षाकृत समर्थ परिवार में पैदा हुए थे। पिता की इच्छा के अनुरूप और आधुनिक तालीम के सहारे वे व्यवस्था में जगह पाकर एक आसान जीवन गुज़ार सकते थे जैसा कि आज भी ब्राह्मणवाद की नई ताकतवर व्यवस्था का सहयोगी होकर कामयाब होने के रास्ते मौजूद हैं। उन्होंने छुआछूत झेलने वाले तबकों, भेदभाव झेलने वाली शूद्र जातियों, तमाम वर्णों-वर्गों की स्त्रियों और किसानों-मज़दूरों व तमाम मेहनतकशों के लिए जिस तरह बतौर लेखक-विचारक-प्रचारक और बतौर निर्भीक एक्टिविस्ट संघर्ष किए, उन्हें यहां विस्तार से नहीं दोहरा रहा हूं। उन्हें और उनकी पत्नी सावित्रीबाई को क्रूर ब्राह्मणवादी छल की पहचान कर उसे चुनौती देने और वैकल्पिक राह बनाने, शिक्षा और ख़ासतौर से स्त्री शिक्षा के दरवाज़े खोलने, विधवाओं के पुनर्वास के प्रबंध करने (जिससे मुख्य रूप से ब्राह्मण लड़कियों को भयानक ज़ुल्मों से छुटकारा मिला), किसानों और मजदूरों के हित में काम करने, ब्राह्मणों की तरह ही शूद्रों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तीखे प्रहार करने, जातियों में बंटे समाज को स्वीकार करने वाली राष्ट्र की अवधारणा को सवालों में लाने जैसे महत्वपूर्ण कामों के लिए उचित ही याद किया जा रहा है।

हैरानी की बात यह है कि बराबरी का समाज बनाने का ख़्वाब देखने वालों के संघर्षों को जनता के बीच बेअसर करने में जिस तरह सांप्रदायिकता बल्कि मुसलमानों के ख़िलाफ नफरत का इस्तेमाल किया गया, उसके बरअक्स फुले के इस्लाम या ईसाई धर्मों के प्रति दृष्टि का जि़क्र कतई नहीं किया जा रहा है। फुले के बेजोड़ संघर्षों से घबराए राष्ट्रवादी चोले वाले बाल गंगाधर तिलक जैसे ब्राह्मणवादी विचारकों ने जिस तरह प्रतिगामी विचारों को सांस्कृतिक व राजनीतिक रूप से स्थापित करने के लिए जन-अभियान चलाए, उनकी कामयाबी के तमाम दूसरे कारणों में सांप्रदायिक घृणा का प्रसार बड़े कारगर ढंग से शामिल था। हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की स्थापना (क्रमश: 1915 व 1925) से पहले तिलक (1856-1920) वे सब ज़रूरतें पूरी कर रहे थे जिनके लिए इन संगठनों की शुरुआत की गई। ब्राह्मणवादी वर्चस्व व उसके विरोध के इस संघर्ष में तिलक के सांस्कृतिक रास्ते दूसरे बहुत से उदार, धर्मनिरपेक्ष व प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को भी कहीं न कहीं प्रभावित करते ही थे। फुले इस बारे में सचेत थे। न केवल मज़हब के लिहाज़ से बल्कि भट्टशाही शासन और मुसलमान राजाओं व ब्रिटिश शासन के अंतर को लेकर भी। बकौल गेल ऑम्वेट, फुले जानते थे कि ब्राह्मण शासन या भट्टशाही वह शासन व्यवस्था थी, जिसने राज-सत्ता और धार्मिक वर्चस्व का इस्तेमाल शोषण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए किया था।[2]

अनंत महादेवन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फुले’ के एक दृश्य में उस्मान शेख की भूमिका में जयेश मोरे, जोतीराव फुले की भूमिका में प्रतीक गांधी, सावित्रीबाई फुले की भूमिका में पत्रलेखा व फातिमा शेख की भूमिका में अक्षया गुरव फुले इस्लाम और ईसाइयत के समानता के सिद्धांतों को ‘आर्यभटों’ के धर्म की शूद्रों-अतिशूद्रों के प्रति अत्याचार भरी व्यवस्था की तुलना में उदार, मानवतावादी और मुक्तिवादी महसूस कर रहे थे। उन्होंने इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद साहब की शान में 1891 में एक पोवाड़ा (मराठी में गीत की एक विधा) ‘मानव मुहम्मद’ भी पुणे स्थित सुबोध प्रकाश प्रेस से प्रकाशित कराया था। इसमें वे मुहम्मद साहब का आगमन अंधेरे सायों को उजाले में बदल देने के रूप में देखते हैं। एकेश्वरवादी होने, सबको गले से लगाने, जहालत व पस्ती से ऊपर उठाने, इंसान को इंसान बनाने, इंसानों के बीच भाईचारा कायम करने और इंसानी हक की आवाज़ का बोलबाला करने जैसी ख़ूबियों के लिए वे मुहम्मद साहब का गुणगान करते हैं। स्वाभाविक है कि जिस धर्म में जिन इंसानों को इंसान कहलाने का हक नसीब नहीं था और जिन्हें छुआछूत झेलने जैसे बर्बर आदेशों का पालन करना पड़ता था, उनके लिए इस्लाम के संदेश सुकून भरी हवा के झोंकों की मानिंद थे। दलित उत्पीडऩ के साथ ही मुसलमानों पर होने वाली हिंसा को लेकर भी मुखर आंबेडकरवादी विचारक कंवल भारती भी अपने लेखों में इस तथ्य को रखते रहे हैं। प्रसिद्ध मराठी विचारक प्रो. फखरुद्दीन बेन्नूर लिखते हैं कि शूद्र गुलामी से मुक्ति के लिए मुसलमानी धर्म में शामिल हुए। ‘महात्मा फुले समग्र वाङ्मय’ (संपादक यशवंत दिनकर फडके) के पांचवे संस्करण के पृष्ठ 317 से वे उद्धरण देते हैं- ‘इस्लाम के पांव देश में पड़े तो पवित्र एकेश्वरी धर्म के सामर्थ्य से वे आर्यभटों के मतलबी धर्म की मज़ाक उड़ाने लगे। इससे कुछ शूद्रों ने उत्साह के साथ इस्लाम धर्म स्वीकार करना शुरू किया।’ फुले ने इस्लाम और ईसाई धर्मों का जि़क्र आदर के साथ ही किया। इस्लाम को लेकर उन्होंने यहां तक लिखा- ‘साथ खेलने वाले अपने आस-पास के पड़ोसी, मुसलमान साथियों की संगत में, मेरे मन में मतलबी हिंदू धर्म और उसमें व्याप्त जातिभेद आदि कई झूठी मान्यताओं के बारे में सही विचार आने लगे, इसके लिए मैं उनका उपकार मानता हूं। ‘[3]

जोतीराव फुले मुसलमान शासकों और आम मुसलमान जनता के बीच के फर्क को भी साफ महसूस करते थे। शासकों के अत्याचारों के लिए उन्होंने कभी मुसलमान अवाम को कठघरे में खड़ा नहीं किया। तिलक जैसे विचारक आर्यों की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उन्हें यहां आए विजेता के रूप में देखते थे तो फुले ऐसे सबसे बुरे हमलावरों के रूप में जिन्होंने यहां मेहनतकश जनता का शोषण करने के लिए धार्मिक वर्चस्व की व्यवस्था का इस्तेमाल किया। धर्म परिवर्तन के आधार पर फुले ने शूद्रों को उनके हाल पर नहीं छोड़ दिया था जैसा कि आजकल आरक्षण के मसले पर बहुत से बहुजन विचारक तक सांप्रदायिक भाषा बोलने लगते हैं। गेल ऑम्वेट के मुताबिक, फुले को उनके जीवन के उत्तरकाल में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई जैसी क्रांतिकारी स्त्रीवादियों के प्रभाव ने स्त्री मुद्दों पर और मज़बूत बना दिया था। फुले इन दोनों विदुषियों के बचाव में भी आगे आए थे। हालांकि ‘आर्य-जगत’ में इन दोनों विदुषियों के प्रति उत्साह था। रमाबाई इंग्लैंड चली गईं और ईसाई बन गईं तो दयानंद स्वामी समेत अनेक ब्राह्मण विद्वानों ने उनकी तीखी आलोचना की। लेकिन फुले उनके समर्थन में मज़बूती से खड़े रहे थे।

फुले की इंसानी सोच और सचेत राजनीति सांप्रदायिक भेद बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों और कोशिशों के ख़िला$फ ही रही। फुले का प्रयास था कि प्राथमिक शिक्षा केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं रहे बल्कि इसका लाभ समाज के शूद्र, अतिशूद्र और बहुजन मुसलमान तक पहुंचे। जाहिर है कि बहुजन अवधारणा में मुसलमानों को शामिल कर देखने की दृष्टि फुले ने ही दी, जिसे बाद में उत्तर भारत में उभरी कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी ने भी सैद्धांतिक रूप से अपनाया था। फुले ने हंटर आयोग को प्रस्तुत किए गए अपने प्रतिवेदन में मांग रखी थी कि आम लोगों के कम-से-कम 12 साल तक के बच्चों के लिए प्राइमरी शिक्षा मुफ्त रखी जाए। प्रो. बेन्नूर ने लिखा है कि फुले इस प्रतिवेदन में मुसलमान बच्चों के बारे में अलग से चिंता जताते हैं- ‘मुसलमान भी इन स्कूलों से दूर हैं, पता नहीं क्यों, मराठी या अंग्रेजी के प्रति उनकी रुचि नहीं है और उनकी भाषा के स्कूल भी बहुत कम हैं।’ आम मुसलमानों की तालीम को लेकर फुले की यह सोच और ‘उनकी भाषा’ के स्कूलों की बात उठाना बड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है। भाषा की सांप्रदायिकता या समान नागरिक संहिता के नाम पर हेट-कैम्पेन के असर में आ जाने वाले बुद्धिजीवियों को फुले के ऐसे उदाहरणों से सीखना चाहिए।

एक मिले-जुले माहौल में पले-बढ़े जोतीराव फुले की तालीम स्कॉटिश मिशन के स्कूल में हुई थी। उनकी शिक्षा बीच में बंद कर दी गई थी। उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके पिता गोविंदराव फुले को मनाने वाले लोगों में एक ईसाई विद्वान लिजीट साहब और दूसरे गफ़्फार बेग मुंशी थे। जोतीराव के क्रांतिकारी विचारों के कारण ब्राह्मणवादी समाज में उठ रहे विरोध के स्वरों से आजिज़ आकर पिता ने उन्हें और उनकी पत्नी सावित्रीबाई को घर से निकाल दिया था तो उन्हें सहारा देने वाले और स्कूल चलाने के लिए जगह मुहैया कराने वाले शख़्स उस्मान शेख थे। उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख का भी सावित्रीबाई फुले की सहयोगी के रूप में जि़क्र आता है। सत्यशोधक समाज की स्थापना के समय भी जोतीराव फुले ने सभी समुदायों के लोगों का साथ हासिल करने की नीति अपनाई थी। वैकल्पिक धर्म के रूप में उदारवादी समतामूलक आस्तिकता के प्रवर्तक फुले हिंदू धर्म को इसके ब्राह्मणीय स्वरूप के कारण सख़्ती से ख़ारिज़ करते रहे। गेल ऑम्वेट के मुताबिक, ‘अपनी पुस्तक ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ में वे एक आदर्श परिवार की कहानी कहते हैं, जिसमें पिता बौद्ध बन जाता है, मां ईसाई, बेटी मुसलमान और बेटा एक सत्यधर्मवादी, पर उसमें हिंदू के लिए कोई स्थान नहीं है। वे ब्राह्मण को केवल जातिगत वर्ग नहीं मानते बल्कि कभी न बदलने वाले एक दुष्ट समूह के रूप में देखते हैं। उनका कहना था कि यदि ब्राह्मणों को समाज से कभी मान्यता प्राप्त करनी है, तो उन्हें हिंदू धर्म के प्रति अपने दावे को त्यागना होगा क्योंकि वह उन्हें पृथ्वी के देवता का रूप प्रदान करता है।’ गेल ऑम्वेट यहां फुले को उद्धृत करती हैं- ‘जब सभी आर्य भट-ब्राह्मण अपना सारा बोगस धर्म साहित्य कूड़ेदान में फेंक दें और सभी मनुष्यों से सत्य के आधार पर व्यवहार करना शुरू कर दें, तब निस्संदेह सभी स्त्री तथा पुरुष इस संसार के सृष्टा के सम्मुख नतमस्तक होंगे तथा आर्यों के कल्याण के लिए प्रार्थना करेंगे। ‘[4]

ऐसा नहीं कि फुले को ब्राह्मण समुदाय के लोगों का साथ नहीं मिला था। जागरूक और न्यायप्रिय ब्राह्मण सहयोगियों ने निश्चय ही उनकी खुलकर मदद की थी। ऐसा भी नहीं है कि उस समय सांप्रदायिक विभेद नहीं थे भले ही उनका स्वरूप बाद की भयानक सांप्रदायिकता जैसा नहीं था। सुभाष गाताडे ने हाल में 4 अप्रैल को जनवादी लेखक संघ की दिल्ली इकाई के सम्मेलन में कबीर की कविता ‘हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना\आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना’ को उद्धृत करते हुए कहा कि इस समस्या की जड़ें ब्रिटिश पूर्व भारत में विद्यमान थीं। जोतीराव फुले जैसा विद्वान सांप्रदायिकता की इस विषबेल को लेकर निश्चय ही सचेत था और इसकी काट उसकी मानवतावादी राजनीति में शामिल थी। 1893 के बंबई (अब मुंबई) दंगों से तीन साल पहले फुले का निधन हो चुका था।

उनका सत्यशोधक समाज सांप्रदायिक सद्भाव के अभियान में सक्रिय था। उनके सहयोगी नारायण मेघाजी लोखंडे (1848-1897) जिन्होंने बंबई (अब मुंबई) की पहली ट्रेड यूनियन ‘बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ स्थापित की थी, इन $फसादात के कारण पलायन कर रहे मजदूरों को रोकने, फिरका-वाराना मेल-मिलाप कायम करने और अमन बहाल करने की मुहिम में जी-जान एक किए हुए थे। हिंदू-मुस्लिम तनाव ख़त्म करने के लिए उनकी अगुआई में सर्वधर्म सम्मेलन के नाम से आयोजित की गई सत्यशोधक समाज की रैली में करीब 60 हज़ार लोग शामिल हुए थे। इन प्रयासों के लिए नारायण लोखंडे को ब्रिटिश सरकार की ओर से ‘राव बहादुर’ और ब्रिटिश भारत सरकार की तरफ से ‘जस्टिस ऑफ पीस’ ख़िताब दिए गए थे। जाहिर है, श्रमिक आंदोलन खड़े करने के साथ उन्हें धर्मनिरपेक्ष आधार देने में, जिसने सांप्रदायिक उन्माद के वृहत्तर अभियानों को काफी हद तक रोके रखने में बड़ी भूमिका निभाई, फुले और सत्यशोधक समाज की अहम भूमिका थी। लोखंडे के नेतृत्व में खड़े हो रहे मजदूर आंदोलन की मदद के लिए फुले ख़ुद कपड़ा मिल कर्मचारियों की मीटिंगों में शामिल होते रहे थे। गौरतलब है कि ये सभी कार्यक्रम भारत में वामपंथी मज़दूर आंदोलन के आगमन से का$फी पहले के हैं।

यहां गौर फरमाने की बात यह है कि फुले के लोग सांप्रदायिक एका कायम करने के लिए जन-जुटान कर रहे थे तो ब्राह्मणवादी वर्चस्व की साजिशों के ख़िलाफ मेहनतकश अवाम की एकजुटता के बरअक्स तिलक घरों में होने वाली गणेश पूजा को पहली बार दस दिन के सार्वजनिक गणेशोत्सव के रूप में आयोजित करने की नींव रख रहे थे। महाराष्ट्र में तिलक आदि ने फुले जैसे गैर-ब्राह्मणवादी विचारकों के असर से समतावादी समाज की संभावनाओं को रोकने और ब्राह्मणवादी वर्चस्व की हि$फाज़त के लिए धर्म आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, इतिहास के गौरवीकरण तथा धर्म के आधार पर बाहरी और स्थानीय के भेद को हवा देने जैसी मुहिम छेड़े रखीं। बाद में हिंदू महासभा तथा आरएसएस ने इस काम को और तीखे व प्रभावी ढंग से अपने हाथों में लिया। बेशक, फुले का असर महाराष्ट्र में बरकरार है लेकिन राजनीतिक वर्चस्व की डोर अब हिंदुत्व कही जाने वाली ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथों में है। असल में, फुले के सत्यशोधक समाज के कमज़ोर पडऩे के साथ ही उनकी जैसी दमदार कोशिशें मद्धम पड़ती गई थीं। जहां तक उत्तर भारत में फुले की उपस्थिति का सवाल है तो इस गोशे में उनका नाम बहुजन समाज पार्टी के उभार के साथ फैलता गया। गो कि आंबेडकर भी फुले को अपना गुरु मानते थे और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भी उनके योगदान को कई तरह स्वीकार किया था, लेकिन हिंदी पट्टी के आम अवाम के बीच इस नाम को ले जाने का श्रेय कांशीराम को ही है।
उत्तर भारत में 19वीं सदी में यूं भी दयानंद स्वामी के प्रभाव ने फुले जैसे पुरोधाओं की रेडिकल नवजागरण की आंधी को रोकने और ब्राह्मणवादी वर्ण आधारित जातिवादी वर्चस्व के ढांचे को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी दौर की ऐसी ही एक और शख़्सियत स्वामी विवेकानंद को भी बंगाल और धीरे-धीरे दूसरे हिस्सों में भी व्यापक स्वीकृति हासिल हई जो ब्राह्मणवादी हेजेमनी के हित में ही काम आई।

देखने वाली बात यह है कि जाति के आधार पर नायकों की तलाश करने वाले समाज में फुले के नाम और काम को शूद्रों के बजाय दलितों ने (देर से ही सही) आगे बढ़ाने की ज़रूरत महसूस की। अ$फसोस यह है कि फुले के नाम को लेकर चलने वाली बहुजन राजनीति और फुले के पोस्टरों का इस्तेमाल करने लगीं भिन्न-भिन्न पार्टियों के नाम पर ओबीसी जातियों के बीच से उभरते रहे राजनीतिक क्षत्रप अपनी तमाम मुद्राओं के बावजूद उसी मनुवादी राजनीति के सहारे बनते चले जाने को अभिशप्त नज़र आने लगे, जिसके प्रभावी विरोध की नींव फुले ने रखी थी। फुले की विरोधी राजनीति तो पहले ही उनके जैसे विचारकों की अनुकूलित छवि का इस्तेमाल करने में माहिर है। विडंबना यह है कि बहुजन बुद्धिजीवियों का भी एक हिस्सा फुले के शत्रु विचार की शक्ति का साया तलाशता दिखाई देने लगा है। सवाल यही है कि क्या सांप्रदायिकता के सवाल को ‘सेकुलरों’ की राजनीति कहकर टालने और विशुद्ध हिस्सेदारी हासिल करने की प्राथमिकताओं के कारण यह नौबत आई है जबकि फुले जैसे विचारकों का रोडमैप उपलब्ध था।

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Mazdoor Morcha
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