मनीष आजाद ट्रेन चली जा रही थी। काकोरी का स्टेशन आने वाला था। अशफाक उल्लाह ने चेन खींच दी। बिस्मिल ने दौड़कर इंजन को कब्जा कर लिया। मोहनदास करमचंद गांधी ने कमर में खोंसी पिस्तौल निकाली। ठांय! ठांय हवाई फायर किए। मुठभेड़ के कुछ गार्ड मारे गए, शेष ने समर्पण कर दिया। गांधी और उनके साथी, ट्रेन में रखा सरकारी खजाना ले उड़े!! हालांकि कुछ दिन बाद सभी पकड़े गए। बिस्मिल, अशफाक और गांधी को फांसी हो गयी। लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेना था। लाहौर के एसपी स्कॉट को मारने के लिए भगतसिंह और जवाहरलाल गए। गलती से सांडर्स को मार आये। कुछ माह बाद पकड़े गए , दोनों को फांसी हो गई। सुभाषचंद्र और सरदार पटेल ने आरएसएस जॉइन किया। सरदार, वर्ग अ-ब-स-द के बौद्धिक करते रहे। उधर सुभाष, बिहाने-सांझ, शाखा में जाकर, खूब कसरत करते रहे। ल_ भांजे। भामाकीजै के नारे जमकर लगाए। और घर चले गए। आजादी की लड़ाई से दूर ही रहे। क्योकि ऐसा गुरु गोलवरकर का आदेश था। ही वांटेड नो ट्रबल। तो कोई असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन नही हुआ। अगर हुआ, तो उसका कोई मतलब नही था, सब रामलीला- नौटंकी भर थे। लेकिन फिर हुआ ये, कि 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध हारने के कारण अंग्रेज गरीब हो गए। वे सभी औपनिवेशिक देशो को दान में आजादी देकर लंदन लौट गए। और चुपचाप गमलों में भिंडी उगाने लगें। आपको लगेगा, क्या ही बकवास है। मगर दोस्तों, संघी किस्सों का निचोड़ यही है। तमाम इनके फॉलोवर, चट्टे पट्टे यही जाप करते है, और यकीन करते हैं कि- 1- आजादी, हमे किसी आंदोलन से नही मिली। फोकट ही में मिल गई, क्योकि अंग्रेज दूसरे विश्वयुद्ध से कंगाल हो गए थे। 2- आजादी अहिंसा से नही मिली। वह सुभाष, भगतसिंह, बिस्मिल (अशफाक नही) की सशस्त्र संघर्ष, और फांसी पाने की कुर्बानियों से मिली। 3- महात्मा गांधी के आंदोलन का कोई योगदान नही था। वह तो लाखों लोगों की (जिसमे संघी एक्को नही था) की कुर्बानियो से मिली। और इस तरह की गप्पों को खूब ट्रेक्शन मिलता भी है। लेकिन सोचिये, अगर ऐसा ही सत्य होता। कि गांधी अहिंसा नही, हिंसक साधन अपनाते। फिर तो गांधी नेहरू को भी फांसी हो जाती। अब आजादी की लड़ाई का नेतृत्व कौन करता?? क्या हिंदुस्तान की जनता में तब (या आज) वह माद्दा रहा कि हंसुआ दरांती लेकर, किसी हिंसक नेता की फॉलोवर बन जाती? ऐसा था, तो क्यो न पूरा भारत ॥स्क्र्र जॉइन किया? उसने कांग्रेस जॉइन की। इसलिए की कांग्रेस का कार्यक्रम संयम पर टिका था। वह एक भीरू समाज के लिए उपयुक्त रास्ता था। लेकिन देश मे दूसरी तरफ भी एक आंदोलन तो हो सकता था। सँगठन, और नेता मौजूद थे- क्रस्स्- गोलवरकर, हेडगेवार? ये अगर लड़ सकते थे, तो लड़े काहे नही? भई, देशप्रेम रग रग से टपक ही रहा था, और नेतृत्व करने की अभिलाषा थी, तो किसने रोका था? सुभाष, सरदार, नेहरू, कृपलानी, अबुल कलाम आपको नही पसन्द। माना.. उनकी अहिंसा, सत्याग्रह की रीति नही पसंद। वेल एंड गुड तो अपना ॥स्क्र्र बना लेते। हिंसा से ही लड़ लेते भाई.. ये लाखो कार्यकर्ता, विशाल नेटवर्क, शाखा-ट्रेनिंग -क्या अचार डालने को बनाया था? दरअसल, जिस महान आजादी को, हमने अपनी माटी के बेहतरीन सपूतों के नेतृत्व में, लंबे संघर्ष से हासिल किया। ये लोग 4 दशक तक उस सँघर्ष में, अपनी कनिष्ठा उंगली डुबाने का भी साहस न कर सके। बल्कि किनारे बैठ, चारपाई बिछाकर मैच देखते रहे। लडऩे वाले योद्धाओं पर नुक्ताचीनी करते रहे। जैसे आप आज टीवी पर ढ्ढक्करु देखते हैं, और विराट कोहली को बैटिंग सिखाते हैं। ये गांधी को आजादी के तरीके सिखाते हैं और क्रांतिकारियों की इज्जत का स्वांग करते है। लेकिन न तो भगतसिह को बचाने का आदोंलन किया, न आजाद हिंद फौज के सपोर्ट में कुछ किया। बटुकेश्वर दत्त जैसो ने कम्युनिस्ट दल जॉइन किये। लेकिन एक्को क्रांतिकारी ने छूटकर, आपको क्यो जॉइन नही किया?? आज इन दुर्घर्ष कायरों की प्रोपगंडा मशीन, 80 साल बाद, देश की चौथी पीढ़ी को बता रही है, कि आजादी की लड़ाई किसे, और कैसे लडऩी चाहिए थी!!!!!! लानत है। नहीं, इन पर नही!! इनके पास तो इस ऐतिहासिक जलालत और कमतरी से बचने के लिए झूठ/बकवास के सिवाय, और रास्ता ही क्या है। ये लानत तो आप पर है भई.. जो इस बकवाद पर यकीन करते हैं।