केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया ने मुख्यालय में पड़े हरामखोर कमिश्नरों को काम पर लगाने के लिए जहां एक ओर शनिवार तथा रविवार को भी दफ्तर बुलाना शुरू किया वहीं दूसरी ओर उन्हें विभिन्न अस्पतालों में जाकर वहां की वास्तविक स्थिति को देखने व समझने का आदेश दिया ताकि इन अफसरों को उन कठिनाइयों की समझ आ सके जो अस्पतालों में झेली जा रही हैं।
इसी सिलसिले में श्रीमती टीएल यादेन फाइनेंस कमिश्नर ने तीन सप्ताह पहले यहां का दौरा किया था। संदर्भवश ये वही देवी जी हैं जो अस्पताल द्वारा मांगे जाने वाले स्टाफ पर अपनी वित्तीय आपत्ति लगा देती हैं। किसी भी अस्पताल में कितने मरीजों एवं कितने प्रकार की सेवाओं के लिए कितने डॉक्टर व अन्य स्टा$फ होने चाहिए इसके नियम बाकायदा किताबों में छपे हुए हैं। इसके बावजूद, इन नियमों के अनुसार बार-बार मांगे जाने पर भी स्टाफ उपलब्ध कराने की राह में इस देवी जी के द्वारा सदैव रोड़े अटकाए जा रहे हैं।
अस्पताल के दौरे के समय आईसीयू के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉक्टर वर्मा जो दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से सेवानिवृत्त होकर यहां आए हैं, ने इन देवीजी को अच्छी-खासी खरी-खोटी सुनाई थी। यद्यपि डॉक्टर वर्मा यहां कोई स्थायी तौर पर रहने नहीं आए हैं परन्तु फिर भी इन्होंने अस्पताल एवं मरीजों की बेहतरी के लिए तमाम खामियां उन्हें गिनाई थीं। लेकिन चिकने घड़े पर कोई असर हो तो इन देवी जी पर होता। मजे की बात तो यह है कि अपनी सर्वे रिपोर्ट दाखिल करने की बजाय वे अस्पताल से पूछती हैं कि यहां प्रति दिन प्रति मरीज़ कितना खर्च होता है? यह सवाल पूछने पर उन्हें जरा भी शर्म नहीं आई। यदि उन्हें आज तक यही नहीं पता तो वे मुख्यालय में बैठकर क्या भाड़ झोंक रही हैं?