फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नोटबंदी के ज़रिए आतंकवाद की कमर तोडऩे, 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी करने का झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी तरह 2025 तक देश को टीबी मुक्त करने का जुमला दिया है। प्रधानमंत्री के दावे कि विपरीत टीबी मरीजों की संख्या घटने के बजाय तेजी से बढ़ रही है। जिले में इसी वर्ष एक हज़ार से ज्यादा टीबी मरीज बढ़े हैं यानी प्रतिदिन औसतन तीन लोग टीबी ग्रस्त हुए।
टीबी मरीजों की संख्या तो बढऩी ही थी, जिस तरह ताली थाली बजाने से कोरोना संक्रमण नहीं खत्म हुआ था उसी तरह प्रधानमंत्री द्वारा अखबारों में, सोशल मीडिया पर बड़े बड़े विज्ञापन छपवाने से टीबी भी समाप्त होने वाली नहीं है। इसके लिए टीबी मरीजों की पहचान, उनका पूरा इलाज और उनसे दूसरों को संक्रमण न हो इसकी रोकथाम की व्यवस्था की जानी होती है। यदि किसी टीबी मरीज की दवा बीच में ही छूट जाती है तो वह और भी खतरनाक (मल्टी ड्रग रजिस्टेंस) एमडीआर टीबी का शिकार हो जाता है। खतरनाक बात यह है कि एमडीआर टीबी ग्रस्त मरीज से एमडीआर संक्रमण ही फैलता है। यदि एमडीआर मरीज के इलाज का भी कोर्स पूरा नहीं हुआ तो वह जानलेवा एक्स्ट्रीम ड्रग रजिस्टेंस (एक्सडीआर) संक्रमण से ग्रस्त हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग इस रोग के उन्मूलन के लिए कितना गंभीर है इस बात से समझा जा सकता है कि टीबी मरीजों को भी बीके अस्पताल की ठसाठस भरी ओपीडी में अन्य मरीजों के साथ ही लाइन में लगाया जाता है। यह और खतरनाक इसलिए भी है कि ओपीडी में आए मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, यानी ओपीडी में टीबी मरीजों केे साथ सामान्य मरीज खड़ा करना, टीबी विस्फोट करने जैसा है।
स्वास्थ्य बजट में लगातार कटौती कर रहे प्रधानमंत्री मोदी के जुमलों से यह बीमारी 2025 में समाप्त नहीं होने वाली है। सरकार टीबी मरीजों को दवाओं का पूरा कोर्स तो उपलब्ध करा नहीं पा रही है। टीबी मरीजों को दवाओं के लिए कई सप्ताह तक भटकना पड़ता है। दवाएं नहीं मिलने के कारण एमडीआर मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दवाएं उपलब्ध कराने में असमर्थ सरकार ने अपना पल्ला झाड़ते हुए मरीजों को टीबी की दवाएं निजी मेडिकल स्टोर से खरीदने के लिए कह दिया, स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी रखी कि वह मरीज को बाहर से दवा लेने के लिए कार्ड जारी करेगा।
यानी मरीज को अपनी जान बचाने के लिए प्रतिमाह कमोबेश तीन हजार रुपये की दवा बाहर से खरीदनी होगी। टीबी के अधिकतर मरीज़ निम्न आय वर्ग से आते हैं, उनके लिए दवा खरीदना तो दूर आवश्यक पोष्टिक खुराक तक के पैसे नहीं होते हैं। इसी के मद्देनजर सरकार ने टीबी मरीजों को 500 रुपये प्रतिमाह पोषण राशि देने का प्रावधान किया है। समझने वाली बात यह है कि जो मरीज पोषण के लिए सरकार के 500 रुपयों पर निर्भर हो वह तीन हजार रुपये प्रतिमाह की दवा क्या खरीदेगा। दवा-इलाज के बगैर तो टीबी रोगी संक्रमण फैलाएगा, इसके रोगी तेजी से बढ़ेंगे।
स्वास्थ्य विभाग अपने अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों में आने वालों को तो दवा दे नहीं पाया, और अब जिले में 100 दिन का निक्षय शिविर चलाने का ढोल पीट रहा है। इसके तहत दो मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू वैन) गांव गांव जाकर टीबी मरीजों की पहचान करेंगी। यह नाटक नहीं तो क्या है कि टीबी सेंटरों में मरीज दवा के लिए भटकते रहे और गांवों में खोजे गए टीबी मरीजों को परामर्श और मुफ़्त इलाज की जानकारी दे। कोई गारंटी नहीं है कि स्टाफ की कमी झेल रहे स्वास्थ्य विभाग द्वारा सौ दिन का निक्षय शिविर गंभीरता से चलाया जाएगा, अधिकारी भी सरकार की तरह औपचारिकताएं कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेंगे।
स्वास्थ्य मामलों के जानकारों के अनुसार किसी भी बीमारी का उन्मूलन सरकार के ही प्रयास से संभव है न कि जनता के। देश पोलियो मुक्त इसलिए हो सका कि सरकार ने इसके लिए लगातार पल्स पोलियो अभियान चलाया और जो आज भी जारी है। टीबी का उन्मूलन भी तभी संभव है कि जब सरकार पूरी तरह जिम्मा उठाए, यानी रोगी की पहचान से लेकर उसके पूर्णतया स्वस्थ और टीबी मुक्त होने तक दवा का पूरा कोर्स मुफ्त में उपलब्ध कराना, पोषण की व्यवस्था, टीबी संक्रमण को फैलने से रोकने का पूरा जिम्मा उठाना। यदि सरकारी अस्पताल या टीबी सेंटर पर दवा नहीं मिलीं तो 2025 तक देश से टीबी समाप्त होने का लक्ष्य हास्यास्पद जुमला ही साबित होने वाला है। जानकार विशेषज्ञों का मानना है कि बीते दस वर्षों में टीबी मरीजों की संख्या अति द्रुत गति से बढ़ी है, इसे छिपाने के लिए सरकार के आंकड़े कहीं से भी विश्वसनीय नहीं लगते, वैसे भी जब सरकार विश्वसनीयता न रहे तो उसके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता।