संघी-भाजपाइयों को भारी पडऩे लगी गोमाता
फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) हिंदुओं को गौमाता के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घुट्टी पिला कर सत्ता हासिल करने वृाले संघी-भाजपाइयों को अब यह मुद्दा भारी लगने लगा है। दस साल तक जनता से काउ सेस, सिनेमा के टिकट पर टैक्स, अनाज मंडी में प्रति खरीद एक रुपये सेस आदि गोरक्षा के नाम पर वसूली करने के बाद अब सरकार गो पालकों पर शिकंजा कसने पर भी उतारू है।
सीएम नायब सैनी ने हाल ही आदेश दिया है कि अब दूध दुह कर सड़क पर पशुओं को बेसहारा छोडऩे वाले पशु पालकों से न केवल जुर्माना वसूला जाएगा, एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी। सीएम नायब सैनी या तो बेहद नासमझ हैं या उन्हें सड़कों पर घूमने वाले आवारा पशुओं के बारे में जानकारी नहीं है। सैनी साहब सड़कों पर कोई भी भैंस या बकरी आवारा घूमती नहीं दिखाई देती। सड़कें तो आपकी राजनैतिक रूप से पूजनीय गोमाता और उनके वंश से ही भरी नजऱ आती हैं। आश्चर्यजनक है कि गोमाता इतनी पवित्र और पूजनीय होने के बावजूद कथित गोपालक जिनमें अधिकतर हिंदू धर्म से आते हैं, बावजूद इसके उन्हें भूखा-प्यासा घर से निकाल देते हैं। सैनी साहब का यह कहना भी काफी हद तक गलत है कि दूध दुह कर छोड़ दिया जाता है। जब तक पशु दूध देने लायक रहता है पशुपालक उसको चारा पानी देकर उसका आर्थिक रूप से दोहन करते हैं। यह व्यवस्था लगभग सभी पशुओं पर लागू होती है, लेकिन भैंस-बकरी जब दूध देने लायक नहीं रहतीं तो मालिक उन्हें स्लाटर हाउस में बेच देता है। पूजनीय होने के कारण गोवंश और गोमाता का वध नहीं किया जा सकता। गाय के नाम पर मुसलमानों की हत्या तक करने से पीछे नहीं हटने वाले हिंदू अपनी ऐसी गोमाता जो दूध देने लायक नहीं बचती उससे पीछा छुड़ाने के लिए घर से निकाल देते हैं। दूसरे शब्दों में वह अपनी उस गोमाता का अप्रत्यक्ष रूप से वध करते हैं यानी उन्हें सड़क पर छोड़ तड़पा तड़पा कर मारने का प्रबंध कर देते हैं।
सैनी साहब को समझना चाहिए कि जिस मालिक ने अपनी बेकार हो चुकी गोमाता को सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया है वह उसके पकड़े जाने पर उसे छुड़ाने आने वाला नहीं तो जुर्माना वसूलने और एफआईआर करने की उनकी बातें सिर्फ हवा हवाई ही साबित होने वाली हैं। इस तरह की बातें करने से पहले उन्हें अधिकारियों से यह भी जान लेना चाहिए था कि बीते दस साल में जितने आवारा गोवंश पकड़े गए और उन्हें कितने लोग छुड़ाने? कितने गोवंश को छुड़ाने के लिए मालिकों ने जुर्माना भरा? पता चलेगा कि आधा प्रतिशत मालिक भी पशुओं को छुड़ाने नहीं आए। संदर्भवश यह भी जान लेना चाहिए कि आवारा पशुओं को पकड़कर जुर्माना वसूलने की व्यवस्था पहले से ही चली आ रही है। इन्हें पकड़कर फाटक में बंद किया जाता था और तय शुदा जुर्माना वसूल कर मालिक को सौंपा जाता था, एक दिन से अधिक समय तक फाटक में रखे जाने वाले पशुओं के चारे की कीमत भी मालिक से वसूली जाती थी। किसी मालिक के न आने पर पशुओं को नीलाम कर दिया जाता था। प्रशासनिक अक्षमताओं के चलते वक्त के साथ साथ यह प्रक्रिया ही नष्ट हो गई। अब यदि इन आवारा पशुओं को फाटक में बंद कर दो तो छुटाने वाला कोई नहीं है और अगर नीलामी कर दो तो खरीदने वाला कोई नहीं है। संघी अंधभक्तों के भय के चलते नीलामी में खरीदने वाला कोई नहीं बचा।
दरअसल, सरकार को भी समझ में आने लगा है कि गोमाता अब उसकी राजनीति के लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं रही क्योंकि मुसलमानों ने इस पशु से इतनी दूरी बना ली है कि पुरजोर कोशिशों के बावजूद भी उन पर गोवध के आरोप ठहर नहीं पा रहे। सरकार ने गोरक्षा का ढिंढोरा पीटा कि अधिकतर पशु पालकों को यह विश्वास हो गया कि सरकार उसके बेकार हो चुके गोवंश को शरण देकर मरने तक चारा-पानी इलाज मुहैया कराएगी। यही कारण है कि भाजपा के दस साल के शासनकाल में सड़कों पर सार्वजनिक स्थलों पर भरपूर गोवंश आवारा घूमता मिल जाएगा।
सरकार को प्रत्येक शहर में गोशाला खुलवाने के अपने बड़बोलेपन का अहसास तब हुआ जब वह इन गोशालाओं को चलाने के लिए पर्याप्त बजट नहीं जुटा सकी और आए दिन गोशालाओं की दुर्दशा की खबरें आने से सरकार की थुक्का फजीहत वाली स्थिति हो गई। यही नहीं सड़क पर आवारा घूम रहे यह गोवंश घातक दुर्घटनाओं का कारण बनने लगे, इससे भी सरकार की फजीहत हुई।
राजनीतिक फायदे के लिए किसी को भी इस्तेमाल करने के बाद दूध की मक्खी की तरह निकाल फेकने की संघी फितरत वाली भाजपा के सीएम भी अब गोवंश को राजनीतिक लाभ वाला नहीं मान रहे हैं। सरकार के खजाने पर बोझ बन चुकी यह योजना लगता है सैनी साहब समाप्त करने की तरकीबें निकाल रहे हैं, उनका यह आदेश इसका पहला कदम माना जा सकता है, संभव है कि यदि हिंदू समाज ने उनके इस आदेश का विरोध नहीं किया तो आगे चल कर कुछ और प्रतिबंध लगा कर पिंड छुड़ा लें।