सावरकर पर बनी झूठ से भरपूर, पिटी हुई फिल्म का प्रचार करने उतरे डॉ. चौहान

सावरकर पर बनी झूठ से भरपूर, पिटी हुई फिल्म का प्रचार करने उतरे डॉ. चौहान
June 02 07:19 2024

रनाल (मज़दूर मोर्चा) अंग्रेजी हूकुमत के पिट्ठू एवं हिन्दुत्ववादी संघियों के पूजनीय ‘वीर’ सावरकर पर पिछले दिनों रोहतक जिले के एक बेवकूफ एवं लालची-चापलूस रणदीप हुड्डा ने फिल्म बनाई थी। हिन्दुत्ववादियों के भरपूर प्रचार के बावजूद जनता ने इस फिल्म को मुफ्त में भी देखने लायक नहीं समझा, जाहिर है कि झूठ से भरपूर ये फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप सिद्ध हुई।

करनाल शहर में हिन्दुत्व के ठेकेदार डॉ. वीरेन्द्र सिंह चौहान ने इस पिटी हुई फिल्म का प्रचार करने के लिये असंध स्थित रेडियो ग्रामोदय के एक लाइव कार्यक्रम का आयोजन कराया। इस कार्यक्रम में कई प्रकार के हिन्दुत्ववादी चापलूस भाड़े पर लाए गये थे। इस अवसर पर इन भड़ौतियों ने जमकर स्वयंभू वीर सावरकर के कसीदे पढ़े।

नि:संदेह अपने जीवन के प्रारंभिक काल में सावरकर एक देशप्रेमी क्रान्तिकारी रहा था। लेकिन अपनी सांगठनिक एवं विचारधारात्मक कमजोरियों के चलते वह कभी भी अंग्रेजों के विरुद्ध टिककर जंग नहीं लड़ सका। अपनी आपराधिक प्रवृतियों के चलते उस पर जो फौजदारी मुकदमे दायर हुए थे उनके चलते उसे काला पानी की सज़ा हुई थी। इसके विपरीत स्वतंत्रता संग्राम लडऩे वालों में बहुत से लोगों ने अपनी लड़ाई को जिस राजनीतिक तरीके से लड़ा। उसके चलते उन्हें जेल की सज़ा तो हुई लेकिन काला पानी नहीं भेजा गया। शहीदे आजम भगत सिंह और उन जैसी विचारधारा वालों ने बेशक शुरू में हथियारबंद क्रांति की बात सोची थी परन्तु इसके बावजूद उन्होंने अपनी किसी भी हिंसात्मक कार्रवाई के लिये अंग्रेजी हुकूमत से क्षमा-याचना की अपेक्षा फांसी  पर लटकना बेहतर समझा।

इसके विपरीत सावरकर जेल की सज़ा को सहन नहीं कर पाया। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार अत्यधिक पढ़ा-लिखा ब्राह्मण होने के नाते जेल अधिकारी उस पर उतनी सख्तियां नहीं करते थे जितनी कि अन्य कैदियों पर। उससे शारीरिक काम की अपेक्षा बौद्धिक यानी कि लिखने-पढऩे का काम लेते थे। विदित है कि आज भी तमाम जेलों में पढ़े लिखे कैदियों का इस्तेमाल जेल के प्रबन्धन में किया जाता है। इन्हीं में से कुछ कैदियों को नम्बदार का दर्जा भी प्राप्त होता है। अपने इसी बौद्धिक एवं लेखन प्रतिभा के बल पर सावरकर ने अनेकों बार अंग्रेजी हुकूमत को पत्र लिख कर माफी मांगते हुए विश्वास दिलाया था कि यदि उसे रिहा कर दिया जाए तो वह हुकूमत के विरुद्ध कुछ करने की बजाय उनकी भरपूर सेवा करेगा।
पूरी जांच परख के बाद जब हुकूमत को विश्वास हो गया कि सावरकर अब उनके काम का आदमी बन चुका है तो पहले उसे अंडमान से रत्नागिरी जेल में स्थानांतरित किया गया और बाद में पूर्णतया रिहा कर दिया। इतना ही नहीं सरकार ने उसकी 60 रुपये मासिक पेंशन भी बांध दी। कुछ दिन पेंशन खाने के बाद सावरकर ने जब पेंशन बढ़ाने की मांग की तो सरकार ने कहा कि उसकी पेंशन जि़ले के उपायुक्त के वेतन से भी 10 रुपये फालतू है, इसे और नहीं बढ़ाया जा सकता। पेंशनखोर सावरकर ने सरकार के इशारे पर, स्वतंत्रता संग्राम लडऩे वालों का जम कर विरोध किया। आन्दोलन कार्यों में फूट डालने के लिये हिन्दू-मुस्लिम की नीति को जम कर बढ़ाया। विश्वयुद्ध के दौरान भारतीयों को सेना में भर्ती होने के लिये खूब प्रेरित किया।

इन सब वास्तविक तथ्यों को छिपा कर, इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हुड्डा द्वारा बनाई गई फिल्म का पिटना तो तय था ही, इसलिये वह पिटी भी। उसी फिल्म रूपी मरे हुए सांप को जिंदा करके ज़हर फैलाने का प्रयास डॉ. चौहान व उनके लगुवे-भगुओं ने इस कार्यक्रम के माध्यम से, करने का प्रयास किया है।

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Mazdoor Morcha
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