फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना नगर निगम का प्राथमिक दायित्व है। इसके बावजूद बीते तीसियों वर्ष में इनके पानी का एक भी सैम्पल कभी पास नहीं हो सका। पेयजल में सीवेज मिलावट की शिकायतों की तो कोई गिनती ही नहीं। इस तरह के मिलावटी एवं दुर्गन्धित पानी के सैम्पल ले-ले कर अनेकों बार प्रदर्शनकारी निगम कार्यालय पर जुटते रहे हैं। लेकिन भ्रष्ट एवं नालायक अधिकारियों और राजनेताओं पर कभी कोई असर नहीं हुआ। अब इन्दौर में गंदा पानी पीने से हुई दर्जनों मौतों से कुछ सबक लेने का दिखावा यहां का नगर निगम कर रहा है। पेयजल आपूर्ति को लेकर नगर निगम ने विशेष निगरानी अभियान चलाने का दावा किया है। पूरे शहर की बात तो अब भी नहीं करते, केवल वार्ड नम्बर 46 से इसकी शुरूआत करने की बात कही गई है। यानी कि शेष 45 वार्डों का नम्बर जब आएगा तब आएगा। जो निगरानी पहले दिन से होनी चाहिए उसकी शुरूआत अब करने की बात कह रहे हैं और वह भी केवल एक वार्ड की, मतलब स्पष्ट है कि बाकी शहर की सप्लाई बिना निगरानी के ही चलती रहेगी।
निगरानी भी किसकी करेंगे, केवल ट्यूबवेलों द्वारा निकाले जा रहे भू-जल की। विदित है कि इस शहर में अनेकों ट्यूबवेल ऐसे हैं जिनसे खारा पानी निकलता है। अब ऐसे पानी की क्या जांच करेंगे, इसको मीठा बनाने का कोई संयंत्र नगर निगम के पास नहीं है। निगम केवल ऐसे पानी को मीठे पानी के साथ मिला कर सप्लाई कर सकता है। यदि बहुत ही खारा हो तो उस ट्यूबवेल को बंद किया जा सकता है। यहां असली समस्या तो बूस्टर पंपों पर है जहां भारी मात्रा में पेयजल का भंडारण किया जाता है। उनका सही रख-रखाव न होने के चलते, उनकी छतें टूटी रहती हैं, वहां मलबे का ढेर पड़ा रहता है, उनमें छोटे-बड़े जानवर गिरते रहते हैं। इनकी निगरानी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में या तो निगरान रखे ही नहीं गए हैं और जो रखे भी गए हैं, वे निगरानी की बजाय और ही धंधों में लगे रहते हैं। इसके अलावा जो क्लोरीन आदि इस पानी में मिलाने की व्यवस्था है उसका पालन भी ठीक से नहीं हो पाता। दूसरी बड़ी समस्या पेयजल की जर्जर पाइप लाइनें जगह-जगह से लीक होती रहती हैं और जहां ये लाइनें सीवर लाइन से मिल जाती हैं तो सीवर का पानी भी इन लाइनों में घुस जाता है। बार-बार शिकायतें मिलने के बावजूद नगर निगम अपनी पेयजल लाइनों को सीवर लाइनों से बचा नहीं पा रहा। यदि नगर निगम वास्तव में ही नागरिकों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने का दावा करता है तो उसे अपने ट्यूबवेलों से पानी के सैम्पल लेने के बजाय नागरिकों के घरों से सैम्पल उठा कर लेबोरेटरी भेजने चाहिए, सारी पोल खुल कर सामने आ जाएगी।