एफएमडीए : नया नाम रखने से ही नहीं होने लगते सही काम

एफएमडीए : नया नाम रखने से ही नहीं होने लगते सही काम
October 25 17:22 2023

इस गति से काम करने में तो नीलम-अजरौंदा फ्लाईओवर की मरम्मत में लगा जाएंगे तीन महीने

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा)। विकास के नाम पर रुपयों की लूट और बंदरबांट करने में माहिर एफएमडीए के थके हुए अधिकारी महज सौ मीटर लंबा नीलम-अजरौंदा पुल भी समय पर नहीं बनवा पा रहे हैं। पहले से बने हुए सौ मीटर लंबे पुल के 22 पिलर और दोनों ओर की सडक़ की मरम्मत में दो करोड़ रुपये से अधिक लुटाए जाएंगे लेकिन फिर भी काम लेटलतीफ ही होता जा रहा है। नीलम पुल बंद होने से वाहन चालकों को भी अतिरिक्त ईंधन के रूप में आर्थिक मार सहनी पड़ रही है।

नीलम-अजरौंदा फ्लाईओवर की मरम्मत अप्रैल 2023 में शुरू होने थी लेकिन कभी अतिक्रमण और कभी मौसम का बहाना बना कर काम को टाला जाता रहा। अब एफएमडीए ने दो करोड़ रुपयों में पुल की मरम्मत का प्रोजेक्ट शुरू किया है। यानी मरम्मत के नाम पर प्रति मीटर लभगग दो लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। नीलम पुल नया नहीं बन रहा है बल्कि इसकी मरम्मत की जा रही है। संदर्भवश सुधी पाठक जान लें कि 2020 में भी नीलम पुल के पिलरों की मरम्मत पर करीब पचास लाख रुपये खर्च किए गए थे। तीन साल के भीतर ही एफएमडीए इन पिलरों सहित कुल 22 पिलरों की मरम्मत करवा रहा है। किसी भी निर्माण कार्य के बाद पांच साल तक उसकी देखभाल और मरम्मत का जिम्मा ठेकेदार का होता है लेकिन एफएमडीए के काबिल और ईमानदार अधिकारियों ने पिछले काम को छोड़ते हुए नए सिरे से मरम्मत शुरू करवाई है।

बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश गोयल पुल की मरम्मत में देरी को एफएमडीए द्वारा अक्षम और अयोग्य ठेकेदार को काम दिया जाना मानते हैं। उनके अनुसार कंस्ट्रक्शन और रोड कॉर्पेटिंग की इतनी आधुनिक मशीनें आ गई हैं कि सौ मीटर सडक़ चंद घंटे में बन कर तैयार हो जाती है। रही पिलरों की स्ट्रेंथनिंग की बात तो यह काम भी आधुिनक मशीनों के जरिए चंद दिनों में पूरा किया जा सकता है। जब दो करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं तो ऐसे ठेकेदार को काम देना चाहिए जिसके पास आधुनिक मशीनें हों ताकि चंद दिनों में ही काम पूरा किया जा सके। बेसिक मशीनों से मजदूरों के बल पर काम कराने में तो महीनों लगेंगे ही और खर्च भी ज्यादा होगा। उनका मानना है कि पुल की मरम्मत के बजट की समीक्षा होनी चाहिए क्योंकि इसकी लागत बहुत ज्यादा है।

एफएमडीए ने पुल की मरम्मत के लिए 44 दिन का समय निर्धारित किया है। इसके तहत पहले 22 दिन में अजरौंदा से नीलम की ओर का ट्रैक बनाया जाएगा, बाकी 22 दिन में नीलम से अजरौँदा की साइड का ट्रैक। 25 सितंबर को काम शुरू हुआ था अभी एक ट्रैक की ओर का केवल साठ प्रतिशत तक ही काम पूरा हो सका है, ऐसे में अंदाज लगाया जा सकता है कि पुल की मरम्मत तीन महीने में भी पूरी नहीं हो सकेगी। इसका खामियाजा वाहन चालकों और यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है।

यातायात अधिक होने पर अजरौंदा पर जाम लगता है और दिन भर में हजारों वाहनों का सैकड़ों लीटर ईंधन जाम में फुंक जाता है, इससे प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा है। जाम की हालत में बदरपुर से बीके की ओर आने वाले वाहनों को बाटा पुल की ओर डायवर्ट कर दिया जाता है, पहले से ही यातायात की अधिकता से जूझ रहे बाटा पुल पर भी इस कारण जाम की स्थिति बनी रहती है, और वाहनों को कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगा कर बीके चौक पहुंचना पड़ता है। एफएमडीए अधिकारी शहर और संसाधनों को बर्बाद करने के बाद अब जनता को भी बर्बाद करने में जुटे हैं।

एसीपी ट्रैफिक ने ठेकेदार को धमकाया
नीलम-अजरौंदा पुल की मरम्मत में देरी यातायात पुलिस के लिए भी मुसीबत का सबब बन गई है। पुलिस विभाग के भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार एसीपी ट्रैफिक विनोद कुमार ने ठेकेदार को धमकी दी कि अगर 30 अक्तूबर तक पुल नहीं बना तो वह बैरिकेडिंग खोल कर यातायात शुरू करवा देंगे। ठेकेदार ने न तो उनसे पूछ कर काम शुरू किया है और न ही उसने ट्रैफिक रुकवाने या चलवाने के लिए यातायात पुलिस से कहा था, और वह एसीपी ट्रैफिक के प्रति जवाबदेह है।

एसीपी ट्रैफिक यदि सच में पुल की जल्दी मरम्मत करवाना चाहते हैं तो उन्हें एफएमडीए के थके हुए अधिकारियों को लिखना चाहिए। यह लंबा लेकिन कारगर रास्ता एसीपी को भी ठीक नहीं लगा, इसलिए ठेकेदार को धमकाने का शॉर्टकट अपना कर उन्होंने आला अधिकारियों को खुद की कर्मठता बताई। नगर निगम को निकम्मा संस्थान बनाने के बाद एफएमडीए में पहुचे थके और नाकारा अधिकारियों का इतिहास देखते हुए उनसे किसी काम को तय समय सीमा में पूरा करवाने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

सडक़-नालियां चोक कर रहा पुल की रेलिंग का मलबा नीलम अजरौंदा पुल की रेलिंग भी दोबारा बनाए जाने के लिए तोड़ी जा रही है। मानक के अनुसार तोड़ी गई रेलिंग का निकलने वाला मलबा साथ साथ ट्रक में भर कर हटाया जाना चाहिए। ठेकेदार रेलिंग तुड़वा तो रहा है लेकिन खर्च बचाने के लिए मलबा नहीं भरवा रहा। मलबे को सीधे नीचे फेका जा रहा है जो वहां से गुजर रही नालियों में डंप होकर उन्हें चोक कर रहा है, मलबे के टुकड़े नीचे गुजर रही सडक़ को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। सुरक्षा एवं संरक्षा उपायों के बिना काम करा रहे ठेकेदार को एफएमडीए के अधिकारी भी सुरक्षा मानक के अनुरूप काम कराने को मजबूर नहीं कर पा रहे।

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Mazdoor Morcha
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