नंगे पांव आग पर चलने की कला

नंगे पांव आग पर चलने की कला
August 05 08:10 2024

वेद प्रिय
यह शायद सन 1994 की बात रही हो। मैं और सतबीर चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या पर एक पांच दिवसीय कार्यशाला लेने बीकानेर गए थे। हमारी ठहरने की व्यवस्था खादी आश्रम में थी। कार्यशाला का स्थल भी ज्यादा दूर नहीं था। लगभग 35- 40 प्रतिभागी रहे होंगे। हमारी कार्यशाला ठीक चल रही थी। जो कुछ भी हम दिन में प्रतिभागियों के साथ सांझा करते, वह अगले दिन अखबार राजस्थान पत्रिका व अन्य में आ जाता। एक शाम हमने नंगे पांव आग पर चलने का प्रदर्शन दिया था। प्रतिभागियों के इलावा कोई ज्यादा भीड़ नहीं थी। प्रतिभागियों में से भी 1 -2 साथी ने ही हमारे साथ आग पर चलने की हिम्मत की थी। अगली सुबह यह भी अखबार में छप गया। खबर पढ़ कर शहर के कुछ व्यक्ति हमसे मिलने आए। उन्होंने कहा कि शहर के बहुत से व्यक्ति आपका यह प्रदर्शन देखना चाहते यदि उन्हें पहले पता होता। उन्होंने आगे कहा कि हमें समाचार पत्र में पहले बताना चाहिए था कि अमुक दिनांक को अमुक जगह इस प्रकार का प्रदर्शन किया जाएगा ताकि बहुत से इच्छुक नागरिक जो देखने के उत्सुक थे आ जाते।

हमने आयोजकों के साथ मिलकर एक और प्रदर्शन की योजना बना ली। तुरंत अखबार में दिया गया कि अगले दिन (तिथि ठीक से याद नहीं) डुप्लेक्स कॉलोनी में शाम 8.00 बजे नंगे पांव आग पर चलने का प्रदर्शन किया जाएगा। यह कॉलोनी हमारी कार्यशाला से अलग जगह थी। यहां डूंगरपुर कॉलेज के अधिकांश प्रोफेसर के फ्लैट थे। हम शाम 7:00 बजे ही वहां पहुंच गए। कॉलोनी के इलावा भी शहर से काफी भीड़ देखने आई थी। वहां हमने यह प्रदर्शन दोहरा दिया। इस बार भीड़ में से बहुत से व्यक्तियों ने आग पर स्वयं चलने का अनुभव किया। यह उनके जीवन की बहुत ही रोमांचकारी घटना थी। प्रदर्शन के बाद हमें सामने स्थित फ्लैट में प्रोफेसर ओमप्रकाश (वनस्पति शास्त्र) के साथ चाय पानी पी । यहां बातचीत में कुछ अन्य व्यक्ति भी शामिल हो गए थे।

यह भी अगले दिन अखबार में छप गया ।यहां इस क्षेत्र में इस घटना को बहुत बड़ा चमत्कार समझा गया था । यहां सिद्ध व्यक्तियों के बहुत मठ है। वे ऐसे चमत्कार इस क्षेत्र में प्राय करते रहते हैं। इनके लिए वे लगभग 15000 तक मेहनताना वसूलते हैं। इस प्रकार के प्रदर्शनों से ऐसा माना जाता है कि किसी परिवार पर आई विपत्ति टल जाएगी या कोई अन्य बाधा हो तो दूर हो जाएगी। हमने सिद्धों के प्रदर्शन पहले देखे हुए थे। वे पहले अपने गुरु की पूजा करते हैं। ढोल- ताशे बजाते हैं। अपने गुरु से आशीर्वाद लेते हैं ।इसके बाद वे झूमते हुए आग पर से गुजर जाते हैं ।

हमारी कार्यशाला अच्छी तरह चल रही थी। अब अंतिम दिन आ गया था। समापन समारोह डूंगरपुर मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में हो रहा था। यहां पर प्रतिभागियों के इलावा प्रबुद्ध जनों की भारी भीड़ थी। केवल 2-3 सैंपल के चमत्कारों का प्रदर्शन यहां देना था और बाकी समापन की औपचारिकताएं थी। उपस्थित दर्शकों में से भी 2-3 फीडबैक लेने थे। अचानक एक अजीब घटना हुई। एक व्यक्ति अभी -अभी बाहर से आया था। उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष के बीच रही होगी। वह तुरंत स्टेज पर आ चढ़ा और अध्यक्ष से विनती करने लगा कि उसे चार पांच मिनट बोलने का अवसर दिया जाए। यह कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था फिर भी उसे बोलने का अवसर दे दिया गया। उसने माइक पर आकर सभी के सामने कुछ इस प्रकार का कहा– मैं एक गरीब व्यक्ति हूं। मेरी साइकिल मरम्मत की दुकान है। पिछले कुछ समय से मेरे हालात कुछ ठीक नहीं चल रहे। मैंने अभी 15 दिन पहले ही सिद्धों से अपने परिवार की भलाई के लिए आग पर चलने का अनुष्ठान करवाया था। सिद्धों का कहना था कि अब मेरे दिन फिर जाएंगे। परिवार में खुशहाली हो जाएगी। मैंने अपनी हैसियत से उन्हें 10000 अदा किए थे ।कल ही मैंने इन व्यक्तियों का कार्यक्रम डुप्लेक्स कॉलोनी में देखा ।मेरे बहुत से भ्रम दूर हो गए। मेरे 10000 बेकार चले गए। यदि ये व्यक्ति (हमारी ओर इशारा कर) 20 दिन पहले आए होते और यह सब प्रदर्शन कर दिया होता तो मेरे रुपए बच जाते ।

आग पर चलने की प्रक्रिया
लगभग 8 फुट लंबी 3 फुट चौड़ी और 4 इंच गहरी क्यारी खोदिए। यदि मोटी लकडय़िां है तो लगभग दो क्विंटल, यदि कच्चे कोयले हैं तो लगभग एक क्विंटल, इस क्यारी में जलाएं। लकडिय़ों के कोयले बनने में कुछ समय लगेगा। क्यारी में लगभग तीन इंच मोटी धडक़ते कोयलों की तह बन जानी चाहिए। यदि कोई लकड़ी अधजली रह गई है अर्थात धुंआ है या कोई टुकड़ा अधजला है तो उसे बाहर निकाल कर दूर रख दें। जलते कोयले पर पंखे या गत्ते इत्यादि से हवा करते रहे ताकि वे लाल जलते रहें। ऐसा करने से इन पर राख की परत नहीं बन पाएगी और यदि बनी हुई है तो उसे किसी लोहे की लंबी छड़ के द्वारा झाड़ दें। लगभग आधा किलो ग्राम पिसा नमक इन पर छिडक़ दें।किसी लंबे लोहे की छड़ की सहायता से इन्हें समतल कर ले कहीं अधिक या कहीं कम न रहे ।

अब आप की क्यारी बनकर तैयार है। कच्ची लकडिय़ां चीड़ देवदार आदि कभी नहीं प्रयोग करनी चाहिए। कीकर की लकड़ी सबसे उपयुक्त होती है । चलने से पूर्व सुनिश्चित करें कि आपके कपड़े सिंथेटिक न हों। फुल पैंट न हो। यदि है तो उसे घुटनों तक ऊपर टाइट सरका लें, इसी तरह सलवार भी। ढीला कुर्ता न पहनें। सभी को अपने पांव पानी से धोकर दिखलाएं ताकि शक न रहे कि कहीं कुछ लेप तो नहीं लगा रखा। अब बिना हड़बड़ी के सामान्य गति से इन पर से एक ओर से दूसरी ओर गुजर जाएं । लगभग तीन या चार कदम ही बनेंगे ।आप सुरक्षित पार कर गए हैं। फिर भी सावधानी के लिए बरनाल आदि का प्रबंध रखें और सामने की ओर भी पानी का टब या बाल्टी रख लें।जब दो-तीन साथी ऐसा कर लें तो फिर लोहे की छड़ की सहायता से कोयलों को समतल करें ।उन पर हवा करके राख हटाएँ। नमक छिडक़ें और इसे दोहरा लें, रात के अंधेरे में यह बहुत रोमांचकारी लगेगा। केवल और केवल अनुभवी व इसके जानकार व्यक्तियों की उपस्थिति में ही यह प्रयोग करें अन्यथा भूल कर भी कोशिश न करें। प्रयोग करने के बाद कोयलों को पूरी तरह बुझा दें।

आप यह कैसे कर पाए इस बारे में वैज्ञानिकों की अनेक राय हैं। वैज्ञानिकों के कई सिद्धांत हमारे सामने आए हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी सामने आए हैं। लास एंजिल्स टाइम्स अप्रैल 1984 में जोली बुर्कान कहते हैं ,जब आपने अपने मन में यह ठान लिया है कि मुझे चलना ही है और मेरे पावों को कुछ नहीं होने वाला तो यह आपका विश्वास आपके मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार से दर्ज होता है। यह आपकी मानसिक ताकत को इस कदर बढ़ा देता है कि आपकी शारीरिक क्रियाओं की हरकतें कुछ सीमा तक असामान्य हो जाती हैं ।

यह तो एक मनोवैज्ञानिक बात हुई। इस बारे में एक प्रोफेसर दोहारती ने तो यहां तक कह दिया कि यदि हम शुद्ध भाव से व्रत रखें,ध्यान लगाएं, ब्रह्मचर्य का पालन करें और धार्मिक भाव से प्रार्थना करें तो हम इस प्रकार आग पर चल सकते हैं। हो सकता है सिद्ध इसी प्रकार की अप्रोच रखते हो। लेकिन यह पूर्ण वैज्ञानिक नहीं है। इस बारे में अब तक सर्वाधिक स्वीकार्य सिद्धांत लीडन फ्रॉस्ट प्रभाव है।इस प्रकार जलते कोयलों का तापमान लगभग 1000 से 1200 डिग्री फॉर्नहिट तक होता है। कोयले में अधिकांश कार्बन होती है। यह छिद्रमय होता है। इसके बीच वायु भरी होती है। इसलिए इनकी ऊष्माधारिता अधिक नहीं होती। हमारे शरीर की ऊष्माधारिता तुलनात्मक रूप में अधिक होती है। हमारे शरीर पर पसीना या नमी रहती है। जैसे ही हम धधकते कोयले पर पांव रखते हैं तो यह कोयले की ऊपरी सतह पर रखा जाता है और कोयला दब जाता है। इससे इसका तापमान कुछ गिर जाता है। हमारे शरीर की नमी या पसीना कुछ वाष्पीकृत हो जाता है और एक पतली परत वायु की पांव और आग के बीच में बन जाती है। यह कुचालक होती है। यह ऊष्मारोधी होती है। जेम्स रैंडी का कहना है कि अंगारों पर चलने के लिए यह प्रभाव सहायक है आवश्यक नहीं। कुछ और कारक भी काम करते हैं ,जैसे पांव कितने समय तक आग के संपर्क में रहा। यह अवधि सेकेंड से भी कम समय की होती है। आपके पैरों का तला कितना रफ़ या नाजुक है। कोयलों की तह कितनी मोटी है। आपके चलने की तकनीक क्या है आदि -आदि ।हम धातुओं के साथ इससे आधे तापमान पर भी प्रयोग नहीं कर सकते और करने भी नहीं चाहिए। यह चिपकने वाली आग बनती है ।यह हमें हर हाल में नुकसान पहुंचाएगी।

 

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Mazdoor Morcha
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