फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भाजपा के दस वर्षों के कार्यकाल में नगर निगम में घोटाले, कमीशनखोरी आदि भ्रष्टाचारों में शायद कुछ कमी रह गई थी इसीलिए नए सीएम नायब सैनी की सरकार में निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने एक और सलाहकार रख लिया। सोने के बिस्कुट और महंगे लहंगे की शौकीन निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर अनिल मेहता को अपना निजी सलाहकार घोषित करते हुए आदेश जारी किया कि अब इंजीनियरिंग ब्रांच की सभी फाइलें अनिल मेहता के जरिए ही उन तक भेजी जाएं।
निगमायुक्त के आदेश से इंजीनियरिंग ब्रांच के अधिकारियों में असमंजस और क्षोभ है तो ठेकेदारों में कमीशनखोरी की श्रृंखला में एक और इजाफा होने की चिंता व्याप्त है। एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मैडम ने हाल ही में अपना कमीशन दोगुना कर दिया है। तयशुदा नजराना देने के बावजूद मैडम कई फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं करतीं और अतिरिक्त चढ़ावा मिलने के बाद ही पास करती हैं। यह चढ़ावा राशि भी काफी मोटी होती है। जेई से लेकर मैडम तक तो सबका हिस्सा बंधा हुआ था अब सलाहकार भी बढ़ गए, उनकी भी हिस्सेदारी बनेगी।
मान भी लिया जाए कि मेहता ईमानदार हैं तो जिस संस्थान में नीचे से लेकर ऊपर तक हर अधिकारी का कमीशन तय हो वहां बिना कमीशन लिए उनका अधिकारियों से तालमेल बैठा पाना मुश्किल होगा। दूसरे, घपला पकड़े जाने पर उनके नाम पर भी दाग लगेगा, यह और बात है कि सलाहकार होने के कारण उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता। यह भी पक्की बात है कि वह न तो इंजीनियरिंग ब्रांच में कमीशनखोरी बंद करवा सकते हैं और न ही कमीशनखोरी के कारण होने वाले घटिया निर्माण की गुणवत्ता दुरुस्त करा सकते हैं। तीसरे, वह मैडम के मातहत हैं तो काम भी उनकी ही मर्जी का करेंगे, यानी अब मैडम महंगे गिफ्ट, सोने के बिस्कुट, ब्राइडल वियर आदि की व्यवस्था करने का जिम्मा उन्हें ही सौंप सकती हैं। ऐसे में बहती गंगा में उनके हाथ न गीले होंं ऐसा नामुमकिन लगता है।
अनिल मेहता इस नगर निगम में काफी समय तक अधीक्षण अभियंता रहे हैं और गुडग़ांव से चीफ इंजीनियर पद से रिटायर हुए हैं। नगर निगम की इंजीनियरिंग ब्रांच में एक सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर, दो चीफ इंजीनियर, चार एक्सईएन सहित सौ से अधिक इंजीनियर हैं। फर्जी डिग्री वालों को छोड़ भी दिया जाए तो आईआईटी और जामिया मिल्लिया जैसे संस्थानों के डिग्रीधारक इंजीनियर भी हैं। इंजीनियरों में जाहिरा तौर पर इस बात का दुख और गुस्सा है कि सेवानिवृत्त इंजीनियर को उनके ऊपर बैठा कर यह साबित किया जा रहा है मानो सरकार की नजर में वे लोग अयोग्य हैं। मैडम भी कहीं न कहीं मान चुकी है कि उनके अभियंता महा निकम्मे, नाकारा, कामचोर, रिश्वतखोर और फर्जी डिग्री वाले हैं।
एक इंजीनियर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि विकास के सारे प्रोजेक्ट तो राजनेताओं के आदेश पर बनाए जाते हैं, नेताजी भी बिना सोचे समझे कोई भी घोषणा कर देते हैं। इस घोषणा के आधार पर ही प्रोजेक्ट बनाया जाता है, डीपीआर तैयार की जाती है, इसमें सलाहकार महोदय क्या कर लेंगे। जानकार तो यह भी कहते हैं कि विकास कार्यों में नेता का भी हिस्सा होता है, जब सबका हिस्सा तय है, डीपीआर नेताजी के इशारों पर बन रहा है, ठेकेदार भी कमीशन पहुंचा रहा है तो फिर सलाहकार महोदय प्रोजेक्ट में नया क्या सुझा सकेंगे, यदि उन्होंने सुझाव दे भी दिया तो उस पर अमल कौन करेगा-करवाएगा, सब तो अपनी हिस्सापत्ती ले चुके, उनकी आपत्ति सुनेगा कौन? अनिल मेहता की तैनाती को जानकार सरकार की स्थायी पदों को समाप्त करने की मुहिम से भी जोड़ कर देख रहे हैं। उनके अनुसार सरकार ने हरियाणा कौशल रोजगार निगम की स्थापना ही इसलिए की है कि स्थायी कर्मचारियों के आधे वेतन पर ठेका कर्मचारी तैनात कर काम निकाला जाए। ठेका कर्मियों को स्थायी पदों पर वेतन के अलावा मिलने वाली अन्य सुविधाएं भी नहीं दी जातीं। कहने को तो अनिल मेहता सलाहकार हैं लेकिन बहुत संभावना है कि इंजीनियरिंग शाखा में कोई स्थायी पद खाली होने पर तैनाती करने के बजाय इन्हें बैठा दिया जाए, एफएमडीए इसका उदाहरण है, वहां रिटायर्ड इंजीनियरों को ठेके पर रख कर काम कराया जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल क्या अनिल मेहता सलाहकार बनने के बाद इंजीनियरिंग ब्रांच से गुणवत्तापूर्ण निर्माण करवा पाएंगे और नगर निगम का भ्रष्टाचार समाप्त करवा पाएंगे या भ्रष्टाचार की बहती गंगा में वो भी डुबकी लगाने लगेंगे।