डॉ. सोना चौधरी (बबीता) मैक्सिम गोर्की का विश्वविख्यात उपन्यास ‘माँ (The Mother)’ केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संघर्ष और परिवर्तन का जीवंत दस्तावेज़ है। यह उपन्यास एक साधारण महिला पेलागिया निलोवना की असाधारण यात्रा को प्रस्तुत करता है, जो अपने बेटे के माध्यम से अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध खड़े होने का साहस सीखती है। आज के भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह कृति पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और प्रेरणादायक बन जाती है। गोर्की ने ‘माँ’ में यह सिद्ध किया कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चेतना के जागरण से जन्म लेती है। एक डरपोक, चुप रहने वाली माँ का सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ बन जाना इस उपन्यास का मूल संदेश है। भारत में आज भी करोड़ों महिलाएँ—चाहे वे ग्रामीण हों या शहरी—परिस्थितियों से जूझते हुए अपने परिवार, समाज और देश के लिए मौन त्याग करती हैं। पेलागिया का चरित्र इन्हीं भारतीय महिलाओं का वैश्विक रूप प्रतीत होता है।
‘जब डर टूटता है, तब मनुष्य जन्म लेता है। ‘ यह पंक्ति आज के भारत में युवाओं और महिलाओं दोनों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। किसान आंदोलन, श्रमिक अधिकार, शिक्षा और समानता की लड़ाई—हर जगह हमें वही चेतना दिखाई देती है, जिसे गोर्की ने अपने उपन्यास में उकेरा। आज का भारत तीव्र आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक विषमताओं से भी जूझ रहा है। एक ओर तकनीक और अवसर हैं, तो दूसरी ओर बेरोज़गारी, असमानता और श्रमिक शोषण। ‘माँ’ हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन का आरंभ घर से होता है—संवेदनशील सोच से, साहसिक संवाद से और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता से। ‘क्रांति सबसे पहले मन में होती है, सड़क पर बाद में। ‘ यह कथन भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा है, जहाँ विचार, संवाद और अहिंसक संघर्ष परिवर्तन का आधार रहे हैं। गोर्की का उपन्यास हमें बताता है कि सच्ची क्रांति वह है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। माँ का चरित्र आज के भारत में उस शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर महिला का प्रतीक है, जो केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के लिए सोचती है। आज जब भारतीय महिलाएँ शिक्षा, खेल, विज्ञान, राजनीति और रक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं, तब पेलागिया की यात्रा और भी अर्थपूर्ण हो जाती है। ‘माँ होना केवल जन्म देना नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा देना है। ‘ यह पंक्ति भारतीय मातृत्व की गहराई को व्यक्त करती है। भारत की माँ केवल घर की धुरी नहीं, बल्कि संस्कारों, साहस और संघर्ष की पहली पाठशाला होती है। ‘माँ; उपन्यास हमें यह भी सिखाता है कि बदलाव आसान नहीं होता। भय, विरोध और बलिदान इसकी कीमत होते हैं। परंतु जब एक साधारण व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा होता है, तो वही इतिहास बनाता है।
आज के भारत को ऐसे ही जागरूक नागरिकों की आवश्यकता है—जो प्रश्न पूछें, अन्याय को पहचानें और मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़े हों। अंतत:, मैक्सिम गोर्की की ‘माँ’ आज के भारत के लिए एक दर्पण है—जो हमें हमारी जिम्मेदारियों, संवेदनाओं और संभावनाओं की याद दिलाता है। यह उपन्यास केवल पढऩे की नहीं, बल्कि जीने की कृति है। ‘जो चुप रहते हैं, वे इतिहास नहीं बनाते; जो बोलते हैं, वही भविष्य गढ़ते हैं।’ पूर्व भारतीय $फुटबॉल टीम कप्तान लेखिका एवं शैक्षिक प्रशिक्षक