कनुप्रिया काशी में जो तोडफ़ोड़ हो रही है उसके बारे में किसी का कहना है कि भगवान मूर्तियों में नहीं, कण कण में हैं. किसी का कहना है वहाँ पहले बौद्ध मंदिर थे, जिन्हें तोड़कर इन्हें बनाया गया. कोई कह रहा है कि हर काल मे पुराना टूटता है नया बनता है, कोई कह रहा है इससे पर्यटन बढ़ेगा, विकास होगा, काम मिलेगा जो लोगों के हित मे है. किसी का कहना है कि वो मूर्तियाँ अहिल्याबाई की हैं ही नहीं, कुछ कह रहे हैं कि मुख्य मूर्तियों को म्यूजियम मे रख दिया गया है, बाक़ी विलाप विपक्षी है, बेकार का है.
सबसे ज़्यादा स्थित प्रज्ञ वे हैं जो कह रहे हैं कि जो भी हो , होता रहे आएगा तो मोदी ही. हमारे देश के निर्माताओं ने जब ये निर्णय लिया था कि इतिहास में जो हो चुका वो चुका है, अब जो भी है उसे उसी तरह सहेजा जाएगा तो वह कोई धार्मिक निर्णय नही था. ये ऐतिहासिक धरोहरों को ज्यों का त्यों रहने देने की बात थी, जिसे आप cultural heritage कहते हैं, इसलिये उन्होंने हर धर्म के धार्मिक ऐतिहासिक स्थलों की मरम्मत कराई , संरक्षण करवाया. मसलन नेहरू काल मे उत्तर भारत मे सोमनाथ मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर और आसपास के प्राचीन ढाँचों का संरक्षण किया गया, घाटों और ऐतिहासिक संरचनाओं पर ्स्ढ्ढ द्वारा संरक्षण कार्य किया गया.
इसके अलावा कोणार्क मंदिर का पुनरुद्धार, खजुराहो मंदिर समूह को उपेक्षित अवस्था से अंतरराष्ट्रीय धरोहर तक पहुँचाना, जगन्नाथपुरी मंदिर, केदारनाथ, बद्रीनाथ मंदिर, दक्षिण में बृहदेश्वर मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, रामेश्वरम मंदिर , पट्टकाल मंदिर का ASI द्वारा संरक्षण और बाद में कई मंदिर NESCO सूची में शामिल किये गए. बौद्ध स्थलों में सांची स्तूप (मध्य प्रदेश) का ASI द्वारा संरक्षण, मरम्मत और परिसर विकास किया गया, और उसका अंतरराष्ट्रीय बौद्ध केंद्र के रूप में उभार हुआ, बोधगया (बिहार) महाबोधि मंदिर क्षेत्र का संरक्षण, सारनाथ (उत्तर प्रदेश) में खुदाई, संग्रहालय और स्तूप संरक्षण, अशोक स्तंभ और धम्मचक्र का संरक्षण कराया गया, और कुशीनगर, वैशाली, राजगीर की बौद्ध सर्किट के रूप में पहचान विकसित की गई.
जैन स्थलों जैसे श्रवणबेलगोला (कर्नाटक), गोमतेश्वर प्रतिमा और परिसर का संरक्षण (ASI के तहत), दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू) का संरक्षण किया गया और राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता दी गई, पावापुरी (बिहार), महावीर निर्वाण स्थल का संरक्षण किया गया. मुस्लिम इमारतों और स्थलों जैसे अजमेर शरीफ दरगाह का प्रबंधन ढांचा बनाया गया और संरक्षण किया गया, दिल्ली की जामा मस्जिद, कुतुब मीनार परिसर का ASI द्वारा संरक्षण और मरम्मत, हुमायूँ का मकबरा को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, उसकी संरचनात्मक मरम्मत की गई. जिन प्रमुख ईसाई स्थल जिनका ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) विभाग द्वारा संरक्षण हुआ उनमें हैं, सेंट जेम्स चर्च, दिल्ली, सेंट जॉन चर्च, मेरठ, जो 1857 के विद्रोह से जुड़ा ऐतिहासिक चर्च था जिसका औपनिवेशिक इतिहास के कारण संरक्षण किया गया, सेंट पॉल कैथेड्रल, कोलकाता, बंदेल चर्च, भारत का सबसे पुराना चर्चों में से एक जिसका पुर्तगाली विरासत के कारण संरक्षण किया गया. माउंट मैरी चर्च, बांद्रा (मुंबई), बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस, गोवा, सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर का मक़बरा, पुर्तगाली कालीन धरोहर, (बाद में UNESCO विश्व धरोहर), सेंट थॉमस माउंट चर्च, चेन्नई, वेलंकन्नी चर्च (तमिलनाडु) इन सबका संरक्षण किया गया.
नेहरू जी का मानना था कि ” राज्य का काम आस्था चलाना नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृतियों की रक्षा करना है।” मगर आज हम क्या कर रहे हैं? काशी की पुरानी इमारतों, मूर्तियों, मंदिरों का महज धार्मिक महत्व नही है, सिफऱ् आर्थिक या पर्यटन महत्व नही है, वे ऐतिहासिक दस्तावेज है, सांस्कृतिक धरोहर हैं, cultural heritage हैं, भावी पीढिय़ों की थाती हैं. कम से कम इंसानी सभ्यता की यात्रा में 500-हज़ार साल आगे बढऩे के बाद एक लोकतांत्रिक देश को तो ये दायित्व समझ आना ही चाहिए.
मगर जैसा कि कहते हैं जो दूसरों को सम्मान देता है वही सम्मान पाता है, और जो लोग दूसरों के सम्मान के प्रति समझ नही रखते वे स्वयं का सम्मान भी नही कर सकते, उसी तजऱ् पर दूसरे धर्मो की धार्मिक ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति असंवेदनशील लोगों से ये उम्मीद बेकार है कि वे ख़ुद अपनी धार्मिक ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति संवेदनशील होंगे. जिनके लिए धर्म महज राजनीतिक टूल मात्र है, सत्ता प्राप्त करने की वस्तु, उनसे यही उम्मीद की जा सकती है कि वे धार्मिक पर्यटन के लिये न केवल जंगल नष्ट कर दें बल्कि नए धार्मिक व्यवसायिक कोरिडोरों के लिये एक पुरातन शहर का ऐतिहासिक महत्व ही ख़त्म कर दें. क्योंकि जो आर्थिक लाभ इन कोरिडोरों से मिलेगा, जैसा राम मंदिर ट्रस्ट बनाकर उठा रहे हैं, वो ये बेचारी ऐतिहासिक मूर्तियाँ और धरोहरें कहाँ दे पाएँगी.