क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा कामिनी शर्मा ने आज से 47 साल से पहले 26 मार्च 1978 को ‘एस्कॉट्र्स एम्प्लाइज एंसीलरी एंड ऑटो कॉम्पोनेन्ट, 20/4 मथुरा रोड, फरीदाबाद’ कंपनी ज्वाइन की थी। उनकी नियुक्ति ‘ऑपरेटर’ (रिसेप्शनिस्ट) के पद पर हुई थी लेकिन जल्दी ही कंपनी प्रबंधन ने उन्हें एक सामान्य मज़दूर की तरह असेंबली लाइन पर खड़ा कर दिया था। नौकरी चाहिए थी इसलिए उन्होंने भी इनकार नहीं किया।
कामिनी शर्मा अपनी ड्यूटी के साथ अपनी यूनियन ‘एस्कॉट्र्स एम्प्लाइज यूनियन’ (सम्बद्ध एचएमएस) की गतिविधियों में भी भाग लेती थीं जो एस्कॉट्र्स कंपनी प्रबंधन को नागवार गुजरता था। एक लड़की जिसने अभी-अभी कंपनी ज्वाइन की है मज़दूरों के मुद्दे और कार्य स्थल की परेशानियों को उठाती है, प्रबंधन की भाषा में ‘कंपनी मैनेजमेंट से जुबान लड़ाती है’, कंपनी अधिकारियों को हज़म नहीं हो रहा था। प्रबंधन ने यूनियन से ‘शिकायत’ की। यूनियन चूंकि मालिकों से ‘मधुर संबंध’ बनाए रखना चाहती थी इसलिए यूनियन के नेताओं ने भी उन्हें ‘अपने काम से मतलब’ रखने की हिदायत दी। लीडरों की इस समझाइश नुमा धमकी के बाद भी कामिनी नहीं ‘सुधरीं’! मैनेजमेंट तो खफ़ा था ही नेताजी भी खफ़ा हो गए।
कंपनी प्रबंधन तथा यूनियन नेताओं ने मिलकर कामिनी शर्मा को सबक़ सिखाने की तैयारी शुरू कर दी। उन्हें कई बार यूनियन दफ़्तर बुलाकर डांटा-फटकारा गया, धमकियां दी गईं, बहुत ही गंदी गालियां दी गईं (जिन्हें लिखा नहीं जा सकता, लेकिन सब जानते हैं), पीटने के लिए भी नेताजी ने हाथ उठाया, लेकिन कामिनी शर्मा जो मुद्दे मैनेजमेंट के सामने उठाती थीं उठाती रहीं, मतलब वे नहीं ‘सुधरीं।’ नियुक्ति ‘ऑपरेटर’ के पद पर होने के बाद भी कामिनी शर्मा को बाक़ी मज़दूरों की बगल में असेम्बली लाइन में तो खड़ा कर ही दिया गया था। अब, मैनेजमेंट और यूनियन, दोनों ने मिलकर उन्हें कंपनी से खदेडऩे की मंशा से उनकी नाक में दम करना शुरू कर दिया। निशाना चूकना नहीं चाहिए इसलिए एक आपराधिक षडयंत्र रचा गया। असेंबली लाइन पर मज़दूरों को हाथों में दस्ताने पहनने होते थे। दस्ताने फटे-पुराने होते जा रहे थे और मैनेजमेंट नए दस्ताने खऱीदने पर पैसा ‘ज़ाया’ करने को तैयार नहीं था। नतीजतन, मज़दूरों ने अपने पहने हुए दस्ताने शाम को कंपनी में जमा करने की बजाए अपने बैग में रखकर अपने घर अपने साथ ले जाना शुरू कर दिया था, जिससे सुबह-सुबह फटे दस्तानों को लेकर कलेश न हो। यह हक़ीक़त मैनेजमेंट, यूनियन समेत सभी मज़दूरों को यहां तक कि सुरक्षा गार्डों को भी मालूम थी। वैसे भी सभी मज़दूरों को दस्ताने रखने के लिए लाकर मिले हुए ही नहीं थे।
2 फऱवरी 1989 के दिन योजनाबद्ध तरीक़े से शाम को कंपनी से घर जाते वक़्त सुरक्षा गाड्र्स ने मज़दूरों के बैग की तलाशी शुरू कर दी। बाक़ी मज़दूरों को शायद ‘कॉन्फिडेंस’ में ले लिया गया था इसलिए उनके बैग में दस्ताने नहीं निकले लेकिन कामिनी शर्मा के बैग में पुराने दस्ताने पाए गए। उन्हें चोर घोषित कर हल्ला मचा दिया गया। प्रबंधन के सभी बड़े अधिकारी तथा यूनियन नेता वहां इकठ्ठा होने के लिए तैयार बैठे ही थ। सब घटना स्थल मतलब चोरी बरामदी स्थल पर पहुंच गए। कामिनी शर्मा को चोर ठहरा दिया गया। ‘चोरी करती है, शर्म नहीं आती’, कहकर नेताजी उन्हें मारने भी दौड़े थे, कामिनी शर्मा उस घड़ी को भला कैसे भूल सकती हैं! यह बताते वक़्त, उनकी आंखें नम हो गई थीं और उनके होठ कांपने लगे थे।
चोर कामिनी शर्मा को पुलिस को सौंपने की तैयारियां शुरू हो गईं। तब ही नेता जी उन्हें एक कोने में ले गए और कहा ‘पुलिस की झंझट से बचना चाहती है तो ग़लती मान ले इस्तीफा लिख दे’। कामिनी शर्मा ने उसी दिन इस्तीफा तो लिख दिया लेकिन इंसाफ पाने की जि़द पकड़ ली। उनका आखिऱी वेतन, रुपये 1590 मासिक था। मैनेजमेंट जब तक चाहे ओवरटाइम भी कराता था जिसका कोई भुगतान मज़दूरों को नहीं किया जाता था। हम पहले भी लिख चुके हैं मैनेजमेंट और यूनियन के रिश्ते मधुर और ‘परस्पर सहयोग’ के थे।
2 फऱवरी, 1989 को कामिनी शर्मा एस्कॉट्र्स कंपनी और यूनियन, दोनों बेडिय़ों बोझों से आज़ाद हो गईं। अब उन्होंने दोनों को सबक़ सिखाने और अपना हक़ हासिल करने की ठान ली। वे लेबर कोर्ट गईं लेकिन उनका मुक़दमा दायर हुआ यूनियन के नाम से ही। इस्तीफा लेते वक़्त मैनेजमेंट तथा यूनियन दोनों ने कहा था कि चोरी की बात यहीं ख़त्म हुई लेकिन दोनों ने धोखा किया और श्रम अदालत में कंपनी ने स्टैंड लिया; ‘कामिनी शर्मा चोर हैं, चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ी गई हैं। कंपनी ने तो इस्तीफा लेकर ही छोड़ दिया, इन्हें तो पुलिस को सौंपा जाना चाहिए था, इन्हें तो जेल जाना चाहिए था’।
चूंकि मुक़दमे के दौरान भी कंपनी और यूनियन के संबंध बदस्तूर ‘मधुर और परस्पर सहयोग’ के ही बने रहे और मुक़दमा आगे खिसकने को तैयार ही नहीं था इसलिए कामिनी शर्मा ने यूनियन नेताओं को धन्यवाद देते हुए अपना निजी वक़ील किया। उसके बाद मुक़दमा अपनी न्यायिक गति से आगे बढ़ा। कामिनी शर्मा को चोर साबित करने के सबूत, गवाह प्रस्तुत किए गए। सारी दास्तांँ सुनने के बाद अदालत ने कहा, चोरी की कहानी बक़वास है। बहुत हो चुका, अब वह कहानी यहां न दोहराई जाए।
आखिरकार 24 मार्च 2004 के सूर्योदय के बाद उस ऐतिहासिक मुक़दमे, ई डी/196-89/3799-3804, दिनांक 29.01.1990 के फ़ैसले की घड़ी आ गई जिसकी एक प्रति क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के पास है। लेबर अदालत के सेशन जज अरुण कुमार त्यागी ने फ़ैसला सुनाया; कामिनी शर्मा ने अपनी ड्यूटी में कभी कोई शिकायत नहीं आने दी। उन्होंने ओवरटाइम भी किया जिसका कोई पैसा उन्हें नहीं मिला। दिनांक 02.02.1989 को उन्हें इस्तीफा देने को मज़बूर किया गया। उनकी कोई ग़लती है भी तो उन्हें नोकरी से निकालने की सज़ा नहीं बनती। यह अदालत कंपनी को ये आदेश देती है कि कामिनी शर्मा को काम पर वापस लिया जाए। उन्हें पिछले सालों के पूरे वेतन का भुगतान किया जाए। अदालत की नजऱ में उन्हें 6,00,000/- का भुगतान किया जाए, साथ ही उन्हें कोर्ट खर्च के 5,000/- भी अदा किए जाएं।
15 साल तक मुक़दमा चला, जाने कितनी फब्तियां, मुसीबतें, कामिनी शर्मा ने झेलीं लेकिन वे खुश हुईं कि चलो कुछ न्याय तो हुआ। पैसे मिलेंगे तो लोगों का उधार चुकाउंगी अपने बच्चे की परवरिश अच्छी तरह करुंगी। लेकिन कामिनी शर्मा ग़लत थीं। इतनी बड़ी कंपनी एक अदनी सी मज़दूर से हार मान गई तो कल बाक़ी मज़दूर भी वही करेंगे। कंपनी प्रबंधन ने उन्हें कोई पैसा नहीं दिया और चंडीगढ़ उच्च नायालय में अपील डाल दी। सोचा होगा पिछले 15 साल में इस जि़द्दी महिला का हौसला नहीं टूटा कोई बात नहीं, अगले 15 सालों में टूट जाएगा। लेकिन वैसा नहीं हुआ। कामिनी शर्मा का हौसला जीत गया। उन के पति अशोक शर्मा भी मज़दूर ही थे लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी के हौसले का सम्मान करते हुए उनका पूरा साथ दिया। मुक़दमा उच्च न्यायलय में भी बाकायदा लड़ा गया।
चंडीगढ़ उच्च न्यायालय का फ़ैसला 15 साल बाद नहीं बल्कि 21 साल बाद 2024 में आया और लंगड़े-लूले न्याय को ही लेकर आया : ‘फरीदाबाद लेबर अदालत का 2004 का फ़ैसला ठीक है। उसमें हमें कोई बदलाव की ज़रूरत महसूस नहीं हो रही। कंपनी, 6,00,000/- की रक़म में से जो कुछ पैसा कामिनी शर्मा को उनके सस्पेंशन के दौरान दे चुकी है वह काटकर बाक़ी पैसे का भुगतान कर दे।’ 21 साल के ब्याज तक का कोई जि़क्र नहीं। उच्च न्यायलय चंडीगढ़ की नजऱ में 2004 के 6 लाख की वैल्यू 2024 में भी 6 लाख ही है!
कामिनी शर्मा, कंपनी के अन्याय के साथ ही एक और अन्याय झेलने को भी मज़बूर हैं। उन्हें अपना पीएफ़ खाते अथवा कंपनी के पीएफ़ खाते का नंबर मालूम नहीं। यूएएन नंबर तो उस वक़्त होता ही नहीं था। इसलिए पीएफ़ विभाग उनकी 11 साल की सर्विस के पीएफ की राशी का भुगतान करने को तैयार नहीं। दरअसल पीएफ़ विभाग ने 2010 के आस-पास पुराने तरीक़े से हो रहे काम की जगह कम्प्यूटर से काम करने की पद्धति अपनाई लेकिन पुराने सारे मैन्युअल डेटा को कम्प्यूटर में नहीं डाला। नतीजतन लाखों मज़दूर जिनकी झोंपड़ीनुमा घरों में कागज़-पत्तर को अनंत काल तक संभालकर संजोकर रखने की व्यवस्था नहीं होती भविष्य निधि विभाग में पड़े अपने पुराने पैसे को निकाल ही नहीं पा रहे। मज़दूरों की मेहनत की जाने कितने करोड़ की रक़म पीएफ़ विभाग डकार चुका है या डकारने जा रहा है। पीएफ के निकम्मेपन का खामियाज़ा भी मज़दूरों को ही झेलना है!
‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’, मज़दूरों के साथ हो रहे घोर अन्याय के इस मुद्दे पर एक आंदोलन छेडऩे की तैयारी कर रहा है। हमारे संगठन के एक मित्र और शुभचिंतक ने इसी संबंध में मदद पाने के लिए कामिनी शर्मा तथा अशोक शर्मा को हमसे संपर्क करने की सलाह दी थी। मुक़दमे में पूर्ण न्याय पाना तो मुमकिन ही नहीं, क्योंकि कामिनी शर्मा और उनके परिवार ने 1978 से 2025 तक मतलब 47 में जो झेला है उसके उचित मुआवज़े की तो गणना भी संभव नहीं। वह हिसाब तो अब पूंजीवाद से इकठ्ठा सदियों के बाक़ी पूरे हिसाब-कि़ताब से ही होना है लेकिन ‘न्यायालयीन न्याय’ के अनुसार भी कामिनी शर्मा कम से कम 25 लाख के आर्थिक मुआवज़े की हक़दार हैं। इसीलिए चंडीगढ़ उच्च न्यायलय में फैसले की पुनर्विचार याचिका प्रख्यात मज़दूर वकील कोलिन गोंसालेस के माध्यम से डाल दी गई है। पीएफ़ विभाग से न्याय पाने में हम अपनी समर्थता और सक्षमता रेखांकित कर ही चुके हैं। पूरा पैसा ब्याज सहित वसूला जाएगा।