फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जनता की ऐसी-तैसी करने तथा अपने चहेतों की कमाई कराने के लिए भाजपा सरकार सदैव कोई न कोई मौका ढूंढती रहती है। खट्टर ने बतौर मुख्यमंत्री प्रॉपर्टी आईडी बनाने के नाम पर जहां याशी कम्पनी को 57 करोड़ रुपये भेंट चढ़ाए वहां राज्य की जनता को जी भर कर रुलाया। इस कम्पनी ने शायद ही किसी प्रॉपर्टी की आईडी सही बनाई हो। इसे सही कराने के लिए जरूरतमंद लोगों को दर-दर की ठोकरें खाने के साथ-साथ मोटी-मोटी रिश्वतें विभिन्न बाबुओं को देनी पड़ीं। प्रॉपर्टी आईडी के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि सीएम नायब सिंह सैनी ने पेपरलेस रजिस्ट्री का फरमान जारी करके राज्य की जनता को बुरी तरह से परेशान कर दिया है। इसके द्वारा अब तमाम तरह की रजिस्ट्रियां ऑनलाइन होंगी। इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने का ठेका भी अपने किसी चहेते को दिया गया है। बनाया गया सॉफ्टवेयर तथा पूरा सिस्टम इतना नाकारा है कि रजिस्ट्री कराने वाले लोग तो त्राहि-त्राहि कर ही रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रति-दिन सरकारी खजाने में आने वाली करोड़ों रुपयों की आय भी थम सी गई है।
इसी समस्या को लेकर फरीदाबाद प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स फेडरेशन के महासचिव गुरमीत सिंह देओल ने उपायुक्त को पत्र लिख कर उनका ध्यान आकृष्ट करना चाहा है। पत्र में कहा गया है कि सरकारी विभागों द्वारा बेची गई जायदादों की कन्वेयंस डीड की रजिस्ट्री करने का प्रावधान इस सॉफ्टवेयर में नहीं रखा गया है। सोसायटी के मकानों एवं फ्लैटों का बयनामा नहीं हो पा रहा है। इस प्रक्रिया में सिस्टम ट्रांसफर परमिशन की मांग करता है, जिसकी आवश्यकता केवल ‘हूडा’ के प्लॉटों में ही होती है। इसके अलावा प्लॉट नम्बर व एरिया भी नहीं दर्शा रहा है। लाइसेंसी कॉलोनियों की जायदादों के बयनामे तथा इकरारनामों की रजिस्ट्रियों का प्रावधान भी इस सॉफ्टवेयर में नहीं किया गया है। इसके अलावा 7 ए से बाहर की रजिस्ट्रियों में भी एनओसी की मांग की जा रही है जिसका कोई मतलब यहां बनता ही नहीं। शहरी जायदादों की रजिस्ट्री के लिए भी डीटीपी का एनओसी मांग कर सॉफ्टवेयर की मूर्खता प्रदर्शित की जा रही है। सर्वविदित है कि शहरी जायदादों का सम्बन्ध केवल नगर निगम व ‘हूडा’ से ही होता है। डीटीपी का कार्यक्षेत्र इनके बाहर का होता है। मजे की बात तो यह है कि अदालत द्वारा डिक्री की गई जायदादों की रजिस्ट्री का प्रावधान भी इस सॉफ्टवेयर में नहीं है। इसके साथ-साथ खाना काश्त की रजिस्ट्री में मालिक का नाम भी नहीं दर्शाया जा रहा है।
पेपर अपलोड करने के बाद तत्काल की फीस जमा कराके रजिस्ट्री का प्रावधान, जो पहले होता था, अब नहीं रखा गया है जो कि बहुत आवश्यक है। इसके अलावा मृत्यु उपरांत की वसीयत का भी रजिस्ट्रेशन इस सिस्टम में नहीं हो पा रहा है। जहां करीब 100 रजिस्ट्रियां प्रति दिन हो जाया करती थीं, सरकार द्वारा खड़ी की गई मुसीबत के चलते अब मात्र 15 तक ही हो पा रही हैं। जाहिर है कि जिन 80-90 लोगों की रजिस्ट्री नहीं हो पा रही, वे लोग रोजाना तहसील के धक्के खाने व विभिन्न बिचौलियों तथा बाबुओं को रिश्वत देने को मजबूर होते हैं। सरकार को यदि ऑनलाइन सिस्टम का इतना ही शौक था तो इसे एकदम जनता पर लादने की अपेक्षा पुरानी व्यवस्था के समानांतर भी चलाया जा सकता था। ऐसा करने से पता लग सकता था कि इस सिस्टम में क्या-क्या कमियां हैं लेकिन जिस सरकार को जनहित की कोई चिंता ही न हो और समझने की बुद्धि भी न हो तो ऐसे-ऐसे ही कारनामे होते हैं।
इस मामले में उपायुक्त से कोई विशेष आशा नहीं की जा सकती क्योंकि उनके हाथ तो बंधे हुए हैं। वे अधिक से अधिक जनता की इस मांग को अपने मूर्ख शासकों तक भेज ही सकते हैं, शेष भला बुरा जो होना है वह तो उच्च स्तर से ही होना है।