असीम तिवारी 1971 का वह समय, जब सार्वजनिक मंचों पर कूटनीति मुस्कुरा रही थी और बंद कमरों में भाषा गालियों, धमकियों और नस्लवादी घृणा तक उतर चुकी थी, यह सब कोई अ$फवाह नहीं है, यह खुद अमेरिकी सरकार के डी क्लासिफाइड टेप्स और ट्रांसक्रिप्ट्स में दर्ज है 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में जनसंहार चल रहा था, लाखों शरणार्थी भारत आ चुके थे, दुनिया चुप थी, अमेरिका चुप नहीं था, अमेरिका सक्रिय रूप से पाकिस्तान के साथ खड़ा था, वजह नैतिक नहीं थी, रणनीतिक थी, पाकिस्तान अमेरिका का चीन तक पहुंचने का गुप्त पुल था और भारत उस पुल के रास्ते में खड़ा था व्हाइट हाउस में Richard Niron और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Henery Kissinger के बीच हुई बातचीत के टेप्स आज सार्वजनिक हैं, इन टेप्स में इंदिरा गांधी के लिए जो भाषा इस्तेमाल हुई, वह किसी भी सभ्य कूटनीति की परिभाषा से बाहर है, निक्सन ने इंदिरा गांधी को लेकर कहा कि वह एक जि़द्दी औरत है, कि वह भारत को जानबूझकर युद्ध की ओर ले जा रही है, कि उसे सबक सिखाने की ज़रूरत है,किसिंजर ने बात और आगे बढ़ाई, उन्होंने भारत को कहा कि ये लोग हमेशा पीडि़त बनने का नाटक करते हैं कि भारत सोवियत संघ का पि_ू बन चुका है कि अगर भारत ने युद्ध किया तो उसे अंजाम भुगतना होगा.
एक बातचीत में किसिंजर कहते हैं कि भारत को आर्थिक रूप से घुटनों पर लाया जा सकता है, निक्सन जवाब देते हैं कि भारत को समझना चाहिए कि अमेरिका नाराज़ हुआ तो बहुत कुछ रोक सकता है यह केवल नाराज़गी नहीं थी, यह धमकी थी, खाद्यान्न सहायता रोकने की धमकी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को अलग थलग करने की धमकी और अंत में सैन्य दबाव की धमकी यही वह मानसिकता थी, जिसमें बाद में अमेरिकी सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ाया गया। अब सवाल है कि इंदिरा गांधी ने क्या किया, उन्होंने घबराकर सफाई नहीं दी, उन्होंने अमेरिका को खुश करने के लिए बयान नहीं बदले, उन्होंने युद्ध टालने के लिए शरणार्थियों को नजरअंदाज नहीं किया, व्हाइट हाउस में उनकी मुलाकात औपचारिक रूप से शालीन थी, लेकिन संदेश एकदम स्पष्ट था भारत अपनी नीति खुद तय करेगा, भारत किसी महाशक्ति की नैतिक ठेकेदारी नहीं मानेगा, अगर दुनिया खामोश रहेगी, तो भारत अकेला खड़ा होगा इसके बाद इंदिरा गांधी ने वह कदम उठाया, जिसने अमेरिका को सबसे ज्यादा चुभा, भारत और सोवियत संघ की मैत्री संधि।
यह कूटनीति नहीं थी, यह रणनीतिक एलान था, इसका मतलब साफ था, भारत अकेला नहीं है, अगर दबाव बढ़ा, तो संतुलन बदलेगा] जब दिसंबर 1971 में युद्ध शुरू हुआ और अमेरिकी सातवां बेड़ा आगे बढ़ा, तब भी भारत नहीं रुका, न सेना रुकी, न नीति बदली, न भाषा नरम हुई, इंदिरा गांधी ने न तो युद्ध रोका, न घुटने टेके, न किसी से माफी मांगी और इतिहास ने देखा कि धमकियों की भाषा किसके काम आई और फैसलों की भाषा किसके निक्सन और किसिंजर की बातचीत आज इसलिए पढ़ी जाती है ताकि यह समझा जा सके कि महाशक्तियां कैसे बोलती हैं जब कैमरे बंद होते हैं, और इंदिरा गांधी का अध्याय इसलिए पढ़ा जाता है ताकि यह समझा जा सके कि दबाव के सामने झुकना मजबूरी नहीं, चुनाव होता है.
अब वर्तमान में आइए, ट्रम्प का स्वभाव कूटनीति का नहीं, सौदे का है, वह देशों को रिश्तों में नहीं, लेन देन में देखता है, उसकी भाषा साफ होती है, कभी मजाक में, कभी तंज में, कभी सीधी चेतावनी में, वह टैरिफ की बात करता है तो वह नीति नहीं सुनाता, दबाव का बटन दबाता है, वह व्यापार घाटे की बात करता है तो वह आंकड़ा नहीं दिखाता, वह सामने वाले की गर्दन पकडऩे की जगह खोजता है, यह शैली अपने आप में एक संदेश है, मैं दोस्त भी हूं और दबाव भी, और दोनों एक साथ चलेंगे। मोदी का तरीका टकराव नहीं, प्रबंधन है, वे सार्वजनिक रूप से संबंधों को निजी गर्मजोशी में ढालते हैं, और निजी गर्मजोशी को राष्ट्रीय उपलब्धि की तरह प्रस्तुत करते हैं, स्टेज, भीड़, हाथ मिलाना, तस्वीर, और भाषण का नैरेटिव, यह सब राजनीतिक संचार में काम आता है, लेकिन विदेश नीति का निर्णायक क्षण वहां नहीं होता, निर्णायक क्षण वहां होता है जहां कोई महाशक्ति कहती है कि शर्तें मानिए, और आप तय करते हैं कि शर्तें माननी हैं, तो किस कीमत पर, और नहीं माननी हैं, तो किस तैयारी के साथ ट्रम्प जिस भाषा में दबाव डालता है, उसके सामने मोदी प्राय: प्रतिरोध की भाषा नहीं चुनते, वे सख्त जवाब नहीं देते, वे खिड़की खोलते हैं, बातचीत बढ़ाते हैं, बीच का रास्ता निकालते हैं, इसे आप व्यावहारिकता कह सकते हैं, लेकिन इस व्यावहारिकता का एक साइड इफेक्ट होता है, सामने वाले को यह भरोसा हो जाता है कि दबाव काम करता है, दबाव जब काम करने लगे, तो वह आदत बन जाता है, फिर वह टैरिफ तक नहीं रुकता, वह तकनीक, वीज़ा, रक्षा, ऊर्जा, हर जगह अपना पंजा रखने लगता है.
यहां व्यापकता यह है कि यह केवल दो व्यक्तियों की कहानी नहीं है, यह दो युगों की संरचना है, इंदिरा गांधी का भारत अपेक्षाकृत कम वैश्वीकृत था, तब दबाव के औजार सीमित थे, लेकिन युद्ध की संभावना तीखी थी, आज का भारत व्यापार, टेक्नोलॉजी, वित्त, सप्लाई चेन, और बाजार के धागों से दुनिया में गूंथा हुआ है, दबाव के औजार अधिक हैं, और कई दबाव दिखते भी नहीं, वे निवेश की भाषा में आते हैं, रेटिंग की भाषा में आते हैं, टेक्नोलॉजी एक्सेस की भाषा में आते हैं, इसलिए आज किसी नेता के लिए खुला टकराव चुनना कठिन है, लेकिन कठिन होना और ज़रूरी होना अलग बातें हैं, रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यह नहीं कि आप हर समय लड़ाई करें, इसका मतलब यह है कि आपके पास ना कहने की क्षमता हो, और उस ना के पीछे तैयारी हो मोदी की राजनीति जिस तरह घर में शक्ति का प्रदर्शन करती है, उसी तरह विदेश नीति में भी वह छवि का सहारा लेती है, मजबूत नेता का पोस्टर, विश्वगुरु का मंच, मित्र देशों के साथ फोटो, लेकिन इतिहास पोस्टर नहीं पढ़ता, वह निर्णय पढ़ता है, निर्णय का पाठ यह पूछता है कि क्या आपने दबाव के बाद अपनी स्थिति बदली, क्या आपने अपनी प्राथमिकता छिपाई, क्या आपने असहमति को मुस्कान में दबा दिया, और क्या आपकी शर्तें मेज पर रहीं या केवल भाषण मेंट्रम्प धमकाता है क्योंकि वह जानता है कि धमकी एक मुद्रा है, इंदिरा गांधी ने उसे मुद्रा नहीं बनने दिया, उन्होंने कीमत देखी, और कीमत चुकाने की तैयारी की, मोदी अक्सर कीमत देख कर सौदेबाजी की तरफ चले जाते हैं, यह अंतर सिर्फ रीढ़ का नहीं, यह नीति के चरित्र का अंतर है, 1971 में भारत का चरित्र था कि संकट आपका है तो समाधान भी आपका होगा, चाहे दुनिया साथ दे या न दे, आज चरित्र कई बार यह दिखता है कि दुनिया नाराज़ न हो, इसीलिए भाषा नरम रहे, निर्णय लचीला रहे, और असल लड़ाई बयानबाजी में लड़ी जाए.
इतिहास का न्याय बहुत सादा होता है, वह किसी के प्रति प्रेम या घृणा से नहीं लिखता, वह एक सवाल पूछता है, दबाव आया तो आपने क्या किया, 1971 में दबाव आया, और भारत आगे बढ़ा, आज दबाव आता है, और भारत अक्सर समायोजन करता है, यही वह वाक्य है जो आपकी पीढ़ी के लिए असहज भी है और ज़रूरी भी, क्योंकि बड़ी सत्ता से दोस्ती का सबसे सम्मानजनक रूप वही है जिसमें बराबरी हो, और बराबरी का पहला प्रमाण यह होता है कि आप डर कर नहीं, सोच कर झुकें, और जब झुकना राष्ट्रहित के खिलाफ हो तो बिलकुल न झुकें!