हिंदू धर्म से जाति दंश समाप्त करने का मोहन भागवत का हवाई नुस्खा

हिंदू धर्म से जाति दंश समाप्त करने का मोहन भागवत का हवाई नुस्खा
April 20 14:11 2025

मोहन भागवत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के सरसंघचालक, ने हिंदू धर्म से जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए कोई स्पष्ट “नुस्खा” या नीति-पत्र प्रस्तुत नहीं किया है, लेकिन उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों और बयानों में इस मुद्दे पर विचार व्यक्त किए हैं। उनका दृष्टिकोण मुख्य रूप से हिंदू समाज में एकता और समरसता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिसमें जातिगत भेदभाव को कम करने की बात बार-बार उठाई जाती है।

उनके कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं-
जाति की उत्पत्ति पर विचार : भागवत ने कहा है कि जाति व्यवस्था ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह मानव निर्मित है, विशेष रूप से कुछ पंडितों या विद्वानों द्वारा शास्त्रों की गलत व्याख्या के कारण फैली। उदाहरण के लिए, 5 फरवरी 2023 को मुंबई में संत रविदास जयंती के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भगवान के लिए सभी समान हैं और जाति का कोई आधार नहीं है। उनका यह बयान जाति को धार्मिक आधार से अलग करने की कोशिश को दर्शाता है।

समाज में एकता का आह्वान : भागवत ने बार-बार हिंदू समाज से भाषा, जाति और क्षेत्रीय मतभेदों को भुलाकर एकजुट होने की अपील की है। 5 अक्टूबर 2024 को राजस्थान के बारां में एक सभा में उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को अपनी सुरक्षा और मजबूती के लिए इन भेदों को मिटाना होगा। उनका मानना है कि जातिगत विभाजन ने ऐतिहासिक रूप से समाज को कमजोर किया और बाहरी आक्रमणों का कारण बना।

सामाजिक समरसता पर जोर : भागवत का कहना है कि समाज को सशक्त बनाने के लिए सामाजिक समरसता (सामाजिक सौहार्द) जरूरी है। वे स्वयंसेवकों से कहते हैं कि वे विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क बढ़ाएं और जातिगत कमियों को दूर करने के लिए काम करें। उनका यह दृष्टिकोण व्यावहारिक स्तर पर कार्य करने की ओर इशारा करता है, जैसे कि परिवारों और समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा देना।

कर्म और धर्म का संदेश : संत रविदास जैसे संतों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि समाज की उन्नति के लिए काम करना ही असली धर्म है, न कि केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए जीना। यह अप्रत्यक्ष रूप से जातिगत श्रेष्ठता को नकारता है और सभी को समान रूप से योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। हालांकि, उनके इन बयानों की व्यावहारिक सफलता पर सवाल उठते हैं। आरएसएस का जाति समानता पर रुख ऐतिहासिक रूप से अस्पष्ट रहा है, और संगठन ने कभी जाति व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने के लिए ठोस कदम (जैसे सामाजिक सुधार आंदोलन या नीतिगत बदलाव) नहीं उठाए। संक्षेप में, मोहन भागवत का “नुस्खा” हिंदू समाज में वैचारिक एकता, सामाजिक संवाद और जाति को धार्मिक वैधता से अलग करने पर आधारित है, लेकिन यह अभी तक राजनीतिक प्रचार स्तर पर ज्यादा दिखाई देता है, न कि किसी स्पष्ट सामाजिक कार्ययोजना के रूप में।
(ग्राक की मदद से)

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Mazdoor Morcha
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